दूरदर्शन -----जीवन रुपी सागर में उल्लास और उदासी से जुड़ी अनेक घटनायें लहरों की तरह उमड़ती तो हैं
मगर मनपर उनकी छाप पत्थर पर पड़ी लकीरों की तरह होती है ऐसे ही गीतों का संग्रह है --गीतों के बादल /
हिंदुस्तान ----गीत गुनगुनाने की जरुरत हमारे रोजमर्रा के जीवन को आनंद की अनुभूति से भर देती है /
संगीत और शब्दों के mithas के प्रति चाहत एक प्राकृतिक क्रिया है ''गीतों के बादल ''के गीत रूमानियत
और निजी अंतर्द्वंदों के मिले-जुले भाव प्रस्तुत करते हैं /शुरू से अंत तक इन गीतों के भाव एक-एक पग आगे
बदाते हुए चलते हैं / गीतकार की पीड़ायें इन गीतों में पूरी तरह सजीव होकर उतरी हैं /
शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011
शनिवार, 3 दिसंबर 2011
संजय कुमार --आप के हाथो में जादू है , आप की कृति अतुल्य है , देवेन्द्र जी माँ सस्वती आप को और भी शब्दों का अमृत बरसाने के लिए आशीष दे ...
चेतन रामकिशन-
चेतन रामकिशन ---हमने तो आज तक महोदय की जितनी भी रचना पढ़ी हैं, सबने मन को भावों से, विधाओं से और सत्यता से जोड़ा है!
मुझ नवोदित ने उनके हर एक रचना से ज्ञान प्राप्त किया है! न मैं इन्हें शायर मात्र की संज्ञा दूंगा, न ही कवि की! मैं तो इन्हें पूर्ण साहित्यकार कहता हूँ, जो हर विधा में पारंगत हैं! नमन तुषार जी! "
चेतन रामकिशन -- आप की रचना बहुत ही प्यारी होती है , ह्रदय से आभार --
चेतन रामकिशन- आपकी ओजस्वी रचन्नाओं पर कुछ कमेन्ट करने के लिए शब्द ही नहीं मिल पते! बहुत अनमोल रचना!
Manorma Mishra -- unluckly devendar ji , jab aapki pustak mili, main , bahut beemar hu. hospital me hu.bas lete -lete abhi bhumika hi padhi hai . man sochane par vivash ho gaya ki kabhi -kabhi insaan ke saath kuchh na kuchh aisa ghatata rahata hai jisaki use ummeed nahi hoti..sab kuchh aakankhaoon se pare hota hai... jaise kuchh aapke saath hua..... bahut prerna mili mujhe aapse ki insaan ko himmat nahi khona chahiye .
Manorma Mishra --main to dekhakar dang rah jati hun ki .jindagi ke har ahassas ko itni khoobsoorti se shabdo me kaise pirote hain aap...
Navin C. Chaturvedi --आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' बार बार पढ़ रहा हूँ, वाह क्या गीत हैं, आनंद आ रहा है| एक तो मुंबई में वर्षा और उस पर आप के गीतों की रिमझिम,
Navin C. Chaturvedi--- भोर की हैं अर्चनायें,
शब्दों के चितेरे हैं आप................. :)
Navin C. Chaturvedi---तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
Anand Pandey ----wonderful! Hum to samjhe the ki ashkon ki kishten chuk gayeen-- Par raat ek tasweer ne phir se taqaja kar diya.
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन /.......मैं अभी भी ’गीतों के बादल’ को फाहा-फाहा जी रहा हूँ. आपकी सोच के लालित्य और आपकी लेखिनी के संगीतमय प्रवाह में खूब डूब-उतरा रहा हूँ. इस पर विस्तार से साझा करूँगा. अभी कुछ समय और-और बहने दें./
Toshlendra Pandya-- sir, whether I think your the person who coming on earth to give colours in people blank life.....we need your regular colourful coments to enjoy the beautiful world of God.....
N.p. Jadaun Singh--- ,aapke dwara , AAPKE KAR KAMLON DWARA RACHIT PUSTAK "GEETON KE BAADAL " MUJHE MILI , AAPKI RACHNAON ME EK- EK SHABD SE SHINGAR RAS TAPAKTA HAI, AAP HUM JAISE KARORON PAATHKO KA MAN MOHTE RAHEN. AAPKO BAHUT- BAHUT BADHAIYA ISS SANSKARAN KE LIYE AUR DHANYAVAAD.
Pawan Kumar --Thank you So Much Sir ji..!! Thank you sooo Very much....!! For sending me Your so Beautiful Creation...!! I Love those songs in that book "GEETON kE BAADAL" very much..!!
Subhash Sharma--- Aapke ye--' geeton ke badal ' hi nahi hain-- inmai samudar se bhi jyada gahrai hai.- Aakhen bahut rokne par bhi- gili ho jati hain. Aap ke liye hamare pas shabd nahi hain.-- Aapka Pathak.
Neeraj Tripathi--- ये तुषार के 'गीतों के बादल' हैं,
इनसे पार और कहाँ जाओगे,
इस जीवन की अथाह गर्मी में'
सारी नमी यही पाओगे
Anurag Jagdhari---------
असल ज़िन्दगी में ना जाने कितने झंझावातों से पार हुए हैं आप!सोचता हूँ ना जाने कैसे आप इन सब हालातों में भी कविता करते रहे.खैर दर्द भी कविता को जन्म देता है.अभी कुल जमा 14 कवितायेँ पढ़ी हैं.आप इन हालातों में भी कैसे इतना सृजन कर पाए,आश्चर्य होता है.शेष फिर ..........
Sarita Upadhyaya --तुषार जी ,नमस्कार |
मैं बहुत दिनों से सोच रही थी की आपसे कहूँ न जाने क्यों साहस न जुटा पाई ,आज कह ही रही हूँ मैं भी आपकी पुस्तक ''गीतों के बादल ''को पढ़ने की बड़ी इच्छुक हूँ पार समस्या ये है की वर्तमान में, मैं इस्राएल में हूँ सो नहीं जानती आपसे कैसे कहूँ पुस्तक प्राप्त करने को ;क्या ये पुस्तक नेट प़र उपलब्ध है ---कृपया बताएं |
R.k. Gupta ---तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आ गई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap tushar ji
AAP SACH M BAHUT UMDA LIKHTE HAI ....neya ashok
Navin C. Chaturvedi--- भोर की हैं अर्चनायें,
शब्दों के चितेरे हैं आप................. :)
Niya Ashok --TUSHAR JI --AAJ OFFICE MEN .. AAPKI "GEETON KE BADAL"MILI BAHUT ACCHA LAGA.. BHUMIKA HI PAD KR ..ANKHEN GILI HO GYN... BAHUT MAZBOOT INSAAN HAIN .. AAP ..JO ITNA DUKH SAHKAR BHI JEEVAN KA SANTULAN BANAYE HUE HAIN ....ITNE MUSHKIL DAUR MEN ...AAPNE ITNA UMDA LIKHA HAI.....AAP BAHUT MAHAN HAIN...
Raghvendra Awasthi ---- हर शब्द सराबोर करता है .......भीग - भीग जाता है.. मन .....वाह तुषार जी/
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap ..tushar ji ..
Madhuri Rawat- आपके शब्दों की कशिश भी कुछ कम नहीं तुषार जी /
Sarita Upadhyaya ---vaah apaki lekhani ko pranam lekhani se nikale ek ek shabd ko naman kya likhate hain ----!
Madhuri Rawat-- Command on both languages, Hats off Tushar his ...
Amit Tyagi-- with due respct 2 u... u r an excellent poet..
Kavi Deep Tadiya--- but light is ever same ....like you
Sanjay Kumar--- Tushar ji ,aap ki likhi har pankti men ek nayi soch hoti hai...
Kunwar Ajeet Singh Baghel ---Tushar Ji ,Aapki Kaviytaon ko padhkar lagta hai ki bas sab kuchh chodkar padhte hi raho .
Asha Pandey Ojha Asha ---bahut sundar ,bahut utsaah vardhk
Vijai K Singh--- Aapke paas kavya ki amulya nidhi jo hai ! ! !
Praveen Kumar--- nice lines sir ..........
Vasundhara Pandey ---beautiful sir
Rajesh Kumar Dubey ---हद है दिवानगी की ..वाह वाह
Neeraj Tripathi- मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है , adbhut
Amit Tyagi-- bahut sundar...tushar ji
Sanjay Kumar---क्या कहने आप के सर जी आपकी लेखनी जादू है , आप का जबाब नहीं मैं आप का एक अदना सा प्रसंसक हूँ /
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
आनंद पाण्डेय ----आश्चर्यजनक,हम तो समझे थे कि अश्कों की किश्तें चुक गईं ---पर रात इक तस्वीर ने फिर से तगाजा कर दिया /
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन ....
Neeraj Tripathi-- awesum sir...laajwaab...shringaar ras se labalab
Dinesh Verma ........
चेतन रामकिशन-
चेतन रामकिशन ---हमने तो आज तक महोदय की जितनी भी रचना पढ़ी हैं, सबने मन को भावों से, विधाओं से और सत्यता से जोड़ा है!
मुझ नवोदित ने उनके हर एक रचना से ज्ञान प्राप्त किया है! न मैं इन्हें शायर मात्र की संज्ञा दूंगा, न ही कवि की! मैं तो इन्हें पूर्ण साहित्यकार कहता हूँ, जो हर विधा में पारंगत हैं! नमन तुषार जी! "
चेतन रामकिशन -- आप की रचना बहुत ही प्यारी होती है , ह्रदय से आभार --
चेतन रामकिशन- आपकी ओजस्वी रचन्नाओं पर कुछ कमेन्ट करने के लिए शब्द ही नहीं मिल पते! बहुत अनमोल रचना!
Manorma Mishra -- unluckly devendar ji , jab aapki pustak mili, main , bahut beemar hu. hospital me hu.bas lete -lete abhi bhumika hi padhi hai . man sochane par vivash ho gaya ki kabhi -kabhi insaan ke saath kuchh na kuchh aisa ghatata rahata hai jisaki use ummeed nahi hoti..sab kuchh aakankhaoon se pare hota hai... jaise kuchh aapke saath hua..... bahut prerna mili mujhe aapse ki insaan ko himmat nahi khona chahiye .
Manorma Mishra --main to dekhakar dang rah jati hun ki .jindagi ke har ahassas ko itni khoobsoorti se shabdo me kaise pirote hain aap...
Navin C. Chaturvedi --आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' बार बार पढ़ रहा हूँ, वाह क्या गीत हैं, आनंद आ रहा है| एक तो मुंबई में वर्षा और उस पर आप के गीतों की रिमझिम,
Navin C. Chaturvedi--- भोर की हैं अर्चनायें,
शब्दों के चितेरे हैं आप................. :)
Navin C. Chaturvedi---तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
Anand Pandey ----wonderful! Hum to samjhe the ki ashkon ki kishten chuk gayeen-- Par raat ek tasweer ne phir se taqaja kar diya.
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन /.......मैं अभी भी ’गीतों के बादल’ को फाहा-फाहा जी रहा हूँ. आपकी सोच के लालित्य और आपकी लेखिनी के संगीतमय प्रवाह में खूब डूब-उतरा रहा हूँ. इस पर विस्तार से साझा करूँगा. अभी कुछ समय और-और बहने दें./
Toshlendra Pandya-- sir, whether I think your the person who coming on earth to give colours in people blank life.....we need your regular colourful coments to enjoy the beautiful world of God.....
N.p. Jadaun Singh--- ,aapke dwara , AAPKE KAR KAMLON DWARA RACHIT PUSTAK "GEETON KE BAADAL " MUJHE MILI , AAPKI RACHNAON ME EK- EK SHABD SE SHINGAR RAS TAPAKTA HAI, AAP HUM JAISE KARORON PAATHKO KA MAN MOHTE RAHEN. AAPKO BAHUT- BAHUT BADHAIYA ISS SANSKARAN KE LIYE AUR DHANYAVAAD.
Pawan Kumar --Thank you So Much Sir ji..!! Thank you sooo Very much....!! For sending me Your so Beautiful Creation...!! I Love those songs in that book "GEETON kE BAADAL" very much..!!
Subhash Sharma--- Aapke ye--' geeton ke badal ' hi nahi hain-- inmai samudar se bhi jyada gahrai hai.- Aakhen bahut rokne par bhi- gili ho jati hain. Aap ke liye hamare pas shabd nahi hain.-- Aapka Pathak.
Neeraj Tripathi--- ये तुषार के 'गीतों के बादल' हैं,
इनसे पार और कहाँ जाओगे,
इस जीवन की अथाह गर्मी में'
सारी नमी यही पाओगे
Anurag Jagdhari---------
असल ज़िन्दगी में ना जाने कितने झंझावातों से पार हुए हैं आप!सोचता हूँ ना जाने कैसे आप इन सब हालातों में भी कविता करते रहे.खैर दर्द भी कविता को जन्म देता है.अभी कुल जमा 14 कवितायेँ पढ़ी हैं.आप इन हालातों में भी कैसे इतना सृजन कर पाए,आश्चर्य होता है.शेष फिर ..........
Sarita Upadhyaya --तुषार जी ,नमस्कार |
मैं बहुत दिनों से सोच रही थी की आपसे कहूँ न जाने क्यों साहस न जुटा पाई ,आज कह ही रही हूँ मैं भी आपकी पुस्तक ''गीतों के बादल ''को पढ़ने की बड़ी इच्छुक हूँ पार समस्या ये है की वर्तमान में, मैं इस्राएल में हूँ सो नहीं जानती आपसे कैसे कहूँ पुस्तक प्राप्त करने को ;क्या ये पुस्तक नेट प़र उपलब्ध है ---कृपया बताएं |
R.k. Gupta ---तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आ गई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap tushar ji
AAP SACH M BAHUT UMDA LIKHTE HAI ....neya ashok
Navin C. Chaturvedi--- भोर की हैं अर्चनायें,
शब्दों के चितेरे हैं आप................. :)
Niya Ashok --TUSHAR JI --AAJ OFFICE MEN .. AAPKI "GEETON KE BADAL"MILI BAHUT ACCHA LAGA.. BHUMIKA HI PAD KR ..ANKHEN GILI HO GYN... BAHUT MAZBOOT INSAAN HAIN .. AAP ..JO ITNA DUKH SAHKAR BHI JEEVAN KA SANTULAN BANAYE HUE HAIN ....ITNE MUSHKIL DAUR MEN ...AAPNE ITNA UMDA LIKHA HAI.....AAP BAHUT MAHAN HAIN...
Raghvendra Awasthi ---- हर शब्द सराबोर करता है .......भीग - भीग जाता है.. मन .....वाह तुषार जी/
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap ..tushar ji ..
Madhuri Rawat- आपके शब्दों की कशिश भी कुछ कम नहीं तुषार जी /
Sarita Upadhyaya ---vaah apaki lekhani ko pranam lekhani se nikale ek ek shabd ko naman kya likhate hain ----!
Madhuri Rawat-- Command on both languages, Hats off Tushar his ...
Amit Tyagi-- with due respct 2 u... u r an excellent poet..
Kavi Deep Tadiya--- but light is ever same ....like you
Sanjay Kumar--- Tushar ji ,aap ki likhi har pankti men ek nayi soch hoti hai...
Kunwar Ajeet Singh Baghel ---Tushar Ji ,Aapki Kaviytaon ko padhkar lagta hai ki bas sab kuchh chodkar padhte hi raho .
Asha Pandey Ojha Asha ---bahut sundar ,bahut utsaah vardhk
Vijai K Singh--- Aapke paas kavya ki amulya nidhi jo hai ! ! !
Praveen Kumar--- nice lines sir ..........
Vasundhara Pandey ---beautiful sir
Rajesh Kumar Dubey ---हद है दिवानगी की ..वाह वाह
Neeraj Tripathi- मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है , adbhut
Amit Tyagi-- bahut sundar...tushar ji
Sanjay Kumar---क्या कहने आप के सर जी आपकी लेखनी जादू है , आप का जबाब नहीं मैं आप का एक अदना सा प्रसंसक हूँ /
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
आनंद पाण्डेय ----आश्चर्यजनक,हम तो समझे थे कि अश्कों की किश्तें चुक गईं ---पर रात इक तस्वीर ने फिर से तगाजा कर दिया /
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन ....
Neeraj Tripathi-- awesum sir...laajwaab...shringaar ras se labalab
Dinesh Verma ........
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011
संजय कुमार --
आप के हाथो में जादू है , आप की कृति अतुल्य है , देवेन्द्र जी माँ सस्वती आप को और भी शब्दों का अमृत बरसाने के लिए आशीष दे ...
चेतन रामकिशन ---
हमने तो आज तक महोदय की जितनी भी रचना पढ़ी हैं, सबने मन को भावों से, विधाओं से और सत्यता से जोड़ा है!
मुझ नवोदित ने उनके हर एक रचना से ज्ञान प्राप्त किया है! न मैं इन्हें शायर मात्र की संज्ञा दूंगा, न ही कवि की! मैं तो इन्हें पूर्ण साहित्यकार कहता हूँ, जो हर विधा में पारंगत हैं! नमन तुषार जी! "
आप के हाथो में जादू है , आप की कृति अतुल्य है , देवेन्द्र जी माँ सस्वती आप को और भी शब्दों का अमृत बरसाने के लिए आशीष दे ...
चेतन रामकिशन ---
हमने तो आज तक महोदय की जितनी भी रचना पढ़ी हैं, सबने मन को भावों से, विधाओं से और सत्यता से जोड़ा है!
मुझ नवोदित ने उनके हर एक रचना से ज्ञान प्राप्त किया है! न मैं इन्हें शायर मात्र की संज्ञा दूंगा, न ही कवि की! मैं तो इन्हें पूर्ण साहित्यकार कहता हूँ, जो हर विधा में पारंगत हैं! नमन तुषार जी! "
कुमार -- आप के हाथो में जादू है , आप की कृति ... atuly hai ...
Manorma Mishra --main to dekhakar dang rah jati hun ki .jindagi ke har ahassas ko itni khoobsoorti se shabdo me kaise pirote hain aap...
Navin C. Chaturvedi---
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
Anand Pandey ----wonderful! Hum to samjhe the ki ashkon ki kishten chuk gayeen-- Par raat ek tasweer ne phir se taqaja kar diya.
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन /.......मैं अभी भी ’गीतों के बादल’ को फाहा-फाहा जी रहा हूँ. आपकी सोच के लालित्य और आपकी लेखिनी के संगीतमय प्रवाह में खूब डूब-उतरा रहा हूँ. इस पर विस्तार से साझा करूँगा. अभी कुछ समय और-और बहने दें./
Navin C. Chaturvedi आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' बार बार पढ़ रहा हूँ, वाह क्या गीत हैं, आनंद आ रहा है| एक तो मुंबई में वर्षा और उस पर आप के गीतों की रिमझिम,
Toshlendra Pandya-- sir, whether I think your the person who coming on earth to give colours in people blank life.....we need your regular colourful coments to enjoy the beautiful world of God.....
N.p. Jadaun Singh--- ,aapke dwara , AAPKE KAR KAMLON DWARA RACHIT PUSTAK "GEETON KE BAADAL " MUJHE MILI , AAPKI RACHNAON ME EK- EK SHABD SE SHINGAR RAS TAPAKTA HAI, AAP HUM JAISE KARORON PAATHKO KA MAN MOHTE RAHEN. AAPKO BAHUT- BAHUT BADHAIYA ISS SANSKARAN KE LIYE AUR DHANYAVAAD. NARENDRA SINGH JADAUN
Pawan Kumar --Thank you So Much Sir ji..!! Thank you sooo Very much....!! For sending me Your so Beautiful Creation...!! I Love those songs in that book "GEETON kE BAADAL" very much..!!
Subhash Sharma--- Aapke ye--' geeton ke badal ' hi nahi hain-- inmai samudar se bhi jyada gahrai hai.- Aakhen bahut rokne par bhi- gili ho jati hain. Aap ke liye hamare pas shabd nahi hain.-- Aapka Pathak.
Neeraj Tripathi--- ये तुषार के 'गीतों के बादल' हैं,
इनसे पार और कहाँ जाओगे,
इस जीवन की अथाह गर्मी में'
सारी नमी यही पाओगे
Anurag Jagdhari---------
असल ज़िन्दगी में ना जाने कितने झंझावातों से पार हुए हैं आप!सोचता हूँ ना जाने कैसे आप इन सब हालातों में भी कविता करते रहे.खैर दर्द भी कविता को जन्म देता है.अभी कुल जमा 14 कवितायेँ पढ़ी हैं.आप इन हालातों में भी कैसे इतना सृजन कर पाए,आश्चर्य होता है.शेष फिर ..........
Sarita Upadhyaya --तुषार जी ,
नमस्कार |
मैं बहुत दिनों से सोच रही थी की आपसे कहूँ न जाने क्यों साहस न जुटा पाई ,आज कह ही रही हूँ मैं भी आपकी पुस्तक ''गीतों के बादल ''को पढ़ने की बड़ी इच्छुक हूँ पार समस्या ये है की वर्तमान में, मैं इस्राएल में हूँ सो नहीं जानती आपसे कैसे कहूँ पुस्तक प्राप्त करने को ;क्या ये पुस्तक नेट प़र उपलब्ध है ---कृपया बताएं |
unluckly devendar ji , jab aapki pustak mili, main , bahut beemar hu. hospital me hu.bas lete -lete abhi bhumika hi padhi hai . man sochane par vivash ho gaya ki kabhi -kabhi insaan ke saath kuchh na kuchh aisa ghatata rahata hai jisaki use ummeed nahi hoti..sab kuchh aakankhaoon se pare hota hai... jaise kuchh aapke saath hua.....
bahut prerna mili mujhe aapse ki insaan ko himmat nahi khona chahiye .
R.k. Gupta ---तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आ गई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap tushar ji
AAP SACH M BAHUT UMDA LIKHTE HAI ....neya ashok
Navin C. Chaturvedi--- भोर की हैं अर्चनायें,
शब्दों के चितेरे हैं आप................. :)
Niya Ashok --TUSHAR JI --AAJ OFFICE MEN .. AAPKI "GEETON KE BADAL"MILI BAHUT ACCHA LAGA.. BHUMIKA HI PAD KR ..ANKHEN GILI HO GYN... BAHUT MAZBOOT INSAAN HAIN .. AAP ..JO ITNA DUKH SAHKAR BHI JEEVAN KA SANTULAN BANAYE HUE HAIN ....ITNE MUSHKIL DAUR MEN ...AAPNE ITNA UMDA LIKHA HAI.....AAP BAHUT MAHAN HAIN...
Raghvendra Awasthi ---- हर शब्द सराबोर करता है .......भीग - भीग जाता है.. मन .....वाह तुषार जी/
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap ..tushar ji ..
Madhuri Rawat- आपके शब्दों की कशिश भी कुछ कम नहीं तुषार जी /
Sarita Upadhyaya ---vaah apaki lekhani ko pranam lekhani se nikale ek ek shabd ko naman kya likhate hain ----!
Madhuri Rawat-- Command on both languages, Hats off Tushar his ...
Amit Tyagi-- with due respct 2 u... u r an excellent poet..
Kavi Deep Tadiya--- but light is ever same ....like you
Sanjay Kumar--- Tushar ji ,aap ki likhi har pankti men ek nayi soch hoti hai...
चेतन रामकिशन ---शानदार पंक्तियाँ,शानदार आह्वान,आपके सोहार्द पूर्ण, जोश पूर्ण साहित्य को नमन!
Kunwar Ajeet Singh Baghel ---Tushar Ji ,Aapki Kaviytaon ko padhkar lagta hai ki bas sab kuchh chodkar padhte hi raho .
Asha Pandey Ojha Asha ---bahut sundar ,bahut utsaah vardhk
Vijai K Singh--- Aapke paas kavya ki amulya nidhi jo hai ! ! !
Praveen Kumar--- nice lines sir ..........
Vasundhara Pandey ---beautiful sir
Rajesh Kumar Dubey ---हद है दिवानगी की ..वाह वाह
चेतन रामकिशन- आपकी ओजस्वी रचन्नाओं पर कुछ कमेन्ट करने के लिए शब्द ही नहीं मिल पते! बहुत अनमोल रचना!
Neeraj Tripathi- मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है , adbhut
Amit Tyagi-- bahut sundar...tushar ji
Sanjay Kumar---क्या कहने आप के सर जी आपकी लेखनी जादू है , आप का जबाब नहीं मैं आप का एक अदना सा प्रसंसक हूँ /
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
आनंद पाण्डेय ----आश्चर्यजनक,हम तो समझे थे कि अश्कों की किश्तें चुक गईं ---पर रात इक तस्वीर ने फिर से तगाजा कर दिया /
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन ....
Neeraj Tripathi-- awesum sir...laajwaab...shringaar ras se labalab
Dinesh Verma ........
आप की रचना बहुत ही प्यारी होती है , ह्रदय से आभार
चेतन रामकिशन ----आपकी हर
Manorma Mishra --main to dekhakar dang rah jati hun ki .jindagi ke har ahassas ko itni khoobsoorti se shabdo me kaise pirote hain aap...
Navin C. Chaturvedi---
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
Anand Pandey ----wonderful! Hum to samjhe the ki ashkon ki kishten chuk gayeen-- Par raat ek tasweer ne phir se taqaja kar diya.
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन /.......मैं अभी भी ’गीतों के बादल’ को फाहा-फाहा जी रहा हूँ. आपकी सोच के लालित्य और आपकी लेखिनी के संगीतमय प्रवाह में खूब डूब-उतरा रहा हूँ. इस पर विस्तार से साझा करूँगा. अभी कुछ समय और-और बहने दें./
Navin C. Chaturvedi आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' बार बार पढ़ रहा हूँ, वाह क्या गीत हैं, आनंद आ रहा है| एक तो मुंबई में वर्षा और उस पर आप के गीतों की रिमझिम,
Toshlendra Pandya-- sir, whether I think your the person who coming on earth to give colours in people blank life.....we need your regular colourful coments to enjoy the beautiful world of God.....
N.p. Jadaun Singh--- ,aapke dwara , AAPKE KAR KAMLON DWARA RACHIT PUSTAK "GEETON KE BAADAL " MUJHE MILI , AAPKI RACHNAON ME EK- EK SHABD SE SHINGAR RAS TAPAKTA HAI, AAP HUM JAISE KARORON PAATHKO KA MAN MOHTE RAHEN. AAPKO BAHUT- BAHUT BADHAIYA ISS SANSKARAN KE LIYE AUR DHANYAVAAD. NARENDRA SINGH JADAUN
Pawan Kumar --Thank you So Much Sir ji..!! Thank you sooo Very much....!! For sending me Your so Beautiful Creation...!! I Love those songs in that book "GEETON kE BAADAL" very much..!!
Subhash Sharma--- Aapke ye--' geeton ke badal ' hi nahi hain-- inmai samudar se bhi jyada gahrai hai.- Aakhen bahut rokne par bhi- gili ho jati hain. Aap ke liye hamare pas shabd nahi hain.-- Aapka Pathak.
Neeraj Tripathi--- ये तुषार के 'गीतों के बादल' हैं,
इनसे पार और कहाँ जाओगे,
इस जीवन की अथाह गर्मी में'
सारी नमी यही पाओगे
Anurag Jagdhari---------
असल ज़िन्दगी में ना जाने कितने झंझावातों से पार हुए हैं आप!सोचता हूँ ना जाने कैसे आप इन सब हालातों में भी कविता करते रहे.खैर दर्द भी कविता को जन्म देता है.अभी कुल जमा 14 कवितायेँ पढ़ी हैं.आप इन हालातों में भी कैसे इतना सृजन कर पाए,आश्चर्य होता है.शेष फिर ..........
Sarita Upadhyaya --तुषार जी ,
नमस्कार |
मैं बहुत दिनों से सोच रही थी की आपसे कहूँ न जाने क्यों साहस न जुटा पाई ,आज कह ही रही हूँ मैं भी आपकी पुस्तक ''गीतों के बादल ''को पढ़ने की बड़ी इच्छुक हूँ पार समस्या ये है की वर्तमान में, मैं इस्राएल में हूँ सो नहीं जानती आपसे कैसे कहूँ पुस्तक प्राप्त करने को ;क्या ये पुस्तक नेट प़र उपलब्ध है ---कृपया बताएं |
unluckly devendar ji , jab aapki pustak mili, main , bahut beemar hu. hospital me hu.bas lete -lete abhi bhumika hi padhi hai . man sochane par vivash ho gaya ki kabhi -kabhi insaan ke saath kuchh na kuchh aisa ghatata rahata hai jisaki use ummeed nahi hoti..sab kuchh aakankhaoon se pare hota hai... jaise kuchh aapke saath hua.....
bahut prerna mili mujhe aapse ki insaan ko himmat nahi khona chahiye .
R.k. Gupta ---तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आ गई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap tushar ji
AAP SACH M BAHUT UMDA LIKHTE HAI ....neya ashok
Navin C. Chaturvedi--- भोर की हैं अर्चनायें,
शब्दों के चितेरे हैं आप................. :)
Niya Ashok --TUSHAR JI --AAJ OFFICE MEN .. AAPKI "GEETON KE BADAL"MILI BAHUT ACCHA LAGA.. BHUMIKA HI PAD KR ..ANKHEN GILI HO GYN... BAHUT MAZBOOT INSAAN HAIN .. AAP ..JO ITNA DUKH SAHKAR BHI JEEVAN KA SANTULAN BANAYE HUE HAIN ....ITNE MUSHKIL DAUR MEN ...AAPNE ITNA UMDA LIKHA HAI.....AAP BAHUT MAHAN HAIN...
Raghvendra Awasthi ---- हर शब्द सराबोर करता है .......भीग - भीग जाता है.. मन .....वाह तुषार जी/
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap ..tushar ji ..
Madhuri Rawat- आपके शब्दों की कशिश भी कुछ कम नहीं तुषार जी /
Sarita Upadhyaya ---vaah apaki lekhani ko pranam lekhani se nikale ek ek shabd ko naman kya likhate hain ----!
Madhuri Rawat-- Command on both languages, Hats off Tushar his ...
Amit Tyagi-- with due respct 2 u... u r an excellent poet..
Kavi Deep Tadiya--- but light is ever same ....like you
Sanjay Kumar--- Tushar ji ,aap ki likhi har pankti men ek nayi soch hoti hai...
चेतन रामकिशन ---शानदार पंक्तियाँ,शानदार आह्वान,आपके सोहार्द पूर्ण, जोश पूर्ण साहित्य को नमन!
Kunwar Ajeet Singh Baghel ---Tushar Ji ,Aapki Kaviytaon ko padhkar lagta hai ki bas sab kuchh chodkar padhte hi raho .
Asha Pandey Ojha Asha ---bahut sundar ,bahut utsaah vardhk
Vijai K Singh--- Aapke paas kavya ki amulya nidhi jo hai ! ! !
Praveen Kumar--- nice lines sir ..........
Vasundhara Pandey ---beautiful sir
Rajesh Kumar Dubey ---हद है दिवानगी की ..वाह वाह
चेतन रामकिशन- आपकी ओजस्वी रचन्नाओं पर कुछ कमेन्ट करने के लिए शब्द ही नहीं मिल पते! बहुत अनमोल रचना!
Neeraj Tripathi- मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है , adbhut
Amit Tyagi-- bahut sundar...tushar ji
Sanjay Kumar---क्या कहने आप के सर जी आपकी लेखनी जादू है , आप का जबाब नहीं मैं आप का एक अदना सा प्रसंसक हूँ /
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
आनंद पाण्डेय ----आश्चर्यजनक,हम तो समझे थे कि अश्कों की किश्तें चुक गईं ---पर रात इक तस्वीर ने फिर से तगाजा कर दिया /
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन ....
Neeraj Tripathi-- awesum sir...laajwaab...shringaar ras se labalab
Dinesh Verma ........
आप की रचना बहुत ही प्यारी होती है , ह्रदय से आभार
चेतन रामकिशन ----आपकी हर
उक्त दोनों मुक्तक इस कृति के आमुख माने जा सकते हैं /प्रथम में कवि प्रीत की फुहार को ,धूप -छाँव से सने पलों को,झील की आभा में झाँक कर अपनी भाव -प्रवंचनाओं को व्यक्त करता है /प्रियतमा के स्वच्छ निर्मल बिम्बों को प्रकृति के शाश्वत फ्रेम में जड़ देता है /यह कृति का एक रंग है /दुसरे मुक्तक में कवि महादेवी वर्मा की भाँति ---मैं नीर भरी दुख की बदली अथवा जय शंकर प्रसाद जी के ---आँसू ---की तरह अपनी पीड़ा को एक गरल की तरह हँसते - हँसते पी जाना चाहता है / रचनाओं को इस करीने से सजाया व संवारा गया है ,कि एक लय -प्रवाह अंत तक कहीं टूटता नहीं है ,कहीं बिखरता नहीं है अपितु कवि दिल -दिमाग पर छा
जाता है/उदाहरण के लिए ----
निमिष -निमिष नयनों में क्या है ,एक झील सी प्रीत तुम्हारी,
अंग -अंग पर खेल रही है ,धूप तुम्हारी छाँव हमारी //
एवम
छुपे -छुपे ही रह जाते हैं ,अक्सर आँखों में कुछ आँसू ,
जीने वाले जी लेते हैं ,पी -पी कर ही अपने आँसू //
श्रंगार को रसराज कहा गया है, डा ० हरिवंश राय बच्चन के अनुसार कवि रूमानी- भावनाओं को सहजता से अभिव्यक्त करने में सफल है ,इसमें कोई शक नहीं /गीतों के बादल---- में कवि के कुछ गीत श्रंगार की इस रसमयता को तन्मयता से भर देने में सक्षम हैं------
जितनी रस की धारायें थीं ,उन्मीलित-सी परिप्लावित थीं,
दिशा -दिशा में आवाहन था , मंद हवायें आह्लादित थीं //
एवम
तुम नहाकर चाँदनी में , केश अपने मत सुखाओ ,
रात ठिठकी सी हुई है , चाँद ठिठका -सा खड़ा है //
कवि अपने जीवन की रिक्तता का भी आभास बड़ी सहजता से कराता है ,वो प्रकृति और
प्रियतमा में ऐसा साम्य स्थापित कर देता है कि उसकी अभिव्यक्ति बिम्बों को एकाकार
कर देती है /ऐसा अद्भुत समायोजन ....नदी के दो किनारों की तरह ,प्रीत के दो किनारे नहीं हो सकते ,यह ---तुषार-- जैसे कवि की सामर्थ्य का प्रमाण है /कवि अमूर्त प्रेम को मूर्त प्रेम में ,,,मूर्त प्रेम को अमूर्त प्रेम में ,रेखांकित करता है या मन को ,कहाँ तक छूता हुआ निकल जाता है पता नहीं चलता /
प्रीत के दो - दो किनारे ,हो नहीं सकते यहाँ पर ,
एक तुम छूलो बहाँ पर, एक में छूलूं यहाँ पर //
उक्त तीनों अन्तराएँ प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करने के लिए एक अभिनव उद्यम हैं /कवि द्वारा प्रथम अंतरे में प्रकृति के सुन्दर प्रतीकों का प्रयोग ,प्यार की खुशबु बिखेरने का ,बसंत के आगमन पर नव कोंपलों का आकार लेती प्रियतमा का ,मन प्राणों में घुल जाने का द्रश्य देखते ही बनता है /
इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है //
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा //
और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी //
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से ...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा है नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/
कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है - यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है //
यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /शिल्प ,सज्जा का ध्यान रखता है / कथन , एक मंच की तरह है /अलंकार व समास आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है /जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है /तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा ,लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है / कवि जब निराशा के गहन -अंधकार में घिरता है ,उसकी स्याह चादर में अपने साथ
सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा //
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी / इस जगह पर कवि बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /
तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /कवि का अंदाजे बयाँ एक साथ कितने जादू कर देता है ,देखते ही बनता है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /
संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...
देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो //
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है / वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली
जाता है/उदाहरण के लिए ----
निमिष -निमिष नयनों में क्या है ,एक झील सी प्रीत तुम्हारी,
अंग -अंग पर खेल रही है ,धूप तुम्हारी छाँव हमारी //
एवम
छुपे -छुपे ही रह जाते हैं ,अक्सर आँखों में कुछ आँसू ,
जीने वाले जी लेते हैं ,पी -पी कर ही अपने आँसू //
श्रंगार को रसराज कहा गया है, डा ० हरिवंश राय बच्चन के अनुसार कवि रूमानी- भावनाओं को सहजता से अभिव्यक्त करने में सफल है ,इसमें कोई शक नहीं /गीतों के बादल---- में कवि के कुछ गीत श्रंगार की इस रसमयता को तन्मयता से भर देने में सक्षम हैं------
जितनी रस की धारायें थीं ,उन्मीलित-सी परिप्लावित थीं,
दिशा -दिशा में आवाहन था , मंद हवायें आह्लादित थीं //
एवम
तुम नहाकर चाँदनी में , केश अपने मत सुखाओ ,
रात ठिठकी सी हुई है , चाँद ठिठका -सा खड़ा है //
कवि अपने जीवन की रिक्तता का भी आभास बड़ी सहजता से कराता है ,वो प्रकृति और
प्रियतमा में ऐसा साम्य स्थापित कर देता है कि उसकी अभिव्यक्ति बिम्बों को एकाकार
कर देती है /ऐसा अद्भुत समायोजन ....नदी के दो किनारों की तरह ,प्रीत के दो किनारे नहीं हो सकते ,यह ---तुषार-- जैसे कवि की सामर्थ्य का प्रमाण है /कवि अमूर्त प्रेम को मूर्त प्रेम में ,,,मूर्त प्रेम को अमूर्त प्रेम में ,रेखांकित करता है या मन को ,कहाँ तक छूता हुआ निकल जाता है पता नहीं चलता /
प्रीत के दो - दो किनारे ,हो नहीं सकते यहाँ पर ,
एक तुम छूलो बहाँ पर, एक में छूलूं यहाँ पर //
उक्त तीनों अन्तराएँ प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करने के लिए एक अभिनव उद्यम हैं /कवि द्वारा प्रथम अंतरे में प्रकृति के सुन्दर प्रतीकों का प्रयोग ,प्यार की खुशबु बिखेरने का ,बसंत के आगमन पर नव कोंपलों का आकार लेती प्रियतमा का ,मन प्राणों में घुल जाने का द्रश्य देखते ही बनता है /
इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है //
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा //
और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी //
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से ...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा है नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/
कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है - यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है //
यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /शिल्प ,सज्जा का ध्यान रखता है / कथन , एक मंच की तरह है /अलंकार व समास आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है /जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है /तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा ,लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है / कवि जब निराशा के गहन -अंधकार में घिरता है ,उसकी स्याह चादर में अपने साथ
सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा //
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी / इस जगह पर कवि बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /
तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /कवि का अंदाजे बयाँ एक साथ कितने जादू कर देता है ,देखते ही बनता है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /
संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...
देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो //
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है / वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली
“गीतों के बादल″ ---संघर्षो भरे प्रेम की गाथा" --- ''तुषार देवेन्द्र चौधरी ''
श्रवण शुक्ल----
हाल ही में एक प्रेममहाकाव्य पढ़ने के दौरान जिंदगी के गूढ़ रहस्यों के अनुभव को समझने की कोशिस की इस प्रेममहाकाव्य का नाम है …’गीतों के बादल′ जोकि--- ''तुषार देवेन्द्र चौधरी ''द्वारा लिखित एवं संकलित है. … यह प्रेमकाव्यग्रन्थ इसलिए कहा जा सकता क्योंकि इस काव्यसंग्रह में जीवन भर के अनुभव और प्यार की तरुणाई से लबरेज शब्दों की मालाएं पिरोई गई है .. कहने के लिए यह कविता संग्रह है जोकि जीवन के अनुभवों पर केंद्रित . कवि की जिंदगी में होने वाली उथल-पुथल और संघर्ष को दर्शाता है . लेकिन मेरी नज़र में यह पूरी जिंदगी की गाथा होने के साथ प्यार के प्रतीक के रूप में अपने प्राणप्रिये को समर्पित सन्देश है . जिसको पढकर लोग अपने जीवन के अनुभव को महसूस करेंगे और एक-एक लाइन में होने वाले संघर्ष को जीना चाहेंगे ..कुछ लाइने पूरी जिंदगी को झकझोर देंगी जैसे .-----
. बादलों में, सागरों में ,सिर्फ तेरा ही उमड़ना ,
देखने की जिद हमें थी ,डूबकर तुझमें उतरना //
पूरे काव्य संग्रह में लिखी हर कविता में वो सब है जो एक साधारण कवि की कल्पना से अक्सर बाहर ही होता है .. जिंदगी भर के संघर्ष, प्यार,नफरत, और सहन शीलता की झलक इसमें..बिलकुल पारदर्शी - सी दिखाई देती है /
आप किताब की भूमिका पढेंगे तो आपको एकबारगी लगेगा कि यह किताब मात्र एकतरफा ही होगी जो कवि के जीवन को गौरवान्वित करने का प्रयत्न करेगी.. लेकिन आपको काव्य रचनायें पढते समय भूमिका को संग्रह से हटाना मुश्किल पड़ेगा.. क्योकि भूमिका में कवि ने अपने जीवन की उन घटनाओं का उल्लेख किया है जिसने हर हल , हर समय कवि के जीवन को झकझोर दिया है … यह किताब पढते वक्त आपको कवि के पूरे जीवन के अनुभव कि झलक दिखलाई पड़ेगी /खास बात यह है कि इस किताब को लिखने के काल एवं सारी घटनाओं को कलमबद्ध करते हुए कवि को अपने सुख-दुःख- प्यार-नफरत को पिरोते हुए तीन दशक लंबा वक्त लगा है…
यह किताब इतनी बेहतरीन इसलिए बन पाई है क्योकि इसकी रचना करते समय बहुत ही धैर्य रखा गया है.. तीन दशकों के धैर्य को पिरोती हुई यह किताब आधुनिक रचनाओं की द्रष्टि से अपनी मौलिकता में श्रेष्ठतम लगती है .. आज के कवियो की किताबें सिर्फ २-४ महीनों में ही लिखी जाती हैं इसीलिए वह प्रासंगिकता उनमे नहीं रह पाती जो इस किताब में है..कवितायें जीवन के ऊँचे -नीचे रास्तों पर शब्दों की ऊँगली थामे एक के बाद एक डग भरतीं नज़र आती है, पहला भाग ‘भीगे पथ पर’ की घटनाओं को तीन दशकों तक .... आगे बढाता है…लगता ही नहीं कि हम किसी किताब की अगली कड़ी पढ़ रहे है .. ‘गीतों के बादल′ जीवन के हर पहलू को जीवंत करतीं है ......
कैसे -कैसे स्वरुप हैं प्यार के, प्यार भरे संघर्ष के.. जो जीवन के चरित्र को रोमांचित कर देते हैं /.अभी तक मेरे द्वारा पढ़ी गई प्रेमकाव्यग्रंथों में से सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है यह / मेरी नज़र में यह निर्विवाद रूप से बेहद उम्दा काव्यग्रंथ है.. हम यह नहीं कह सकते कि कौन सी कविता ज्यादा अच्छी है.. और पढ़ना शुरू करने के बाद चाहकर भी हम इससे दूर नहीं भाग सकते . क्योकि इन कविताओ में जीवन का रोमांच छिपा हुआ है. ,/
मैंने इसे अपने ब्लॉग पर इसलिए भी लिखा है क्योकि मेरी नजर में जीवन के सुख-दुःख प्यार नफरत को कविताओं में माध्यम से जीवंत करने का
इससे बेहतर नजरिया हो ही नहीं सकता.. आखिर इसीलिए तो माना जाता है कि “जीवन एक संघर्ष” है जिससे जीत हासिल करना और जीत हासिल करके
भी न जीतना … जीवन से ही सीखना पड़ता है ..
श्रवण शुक्ल----
हाल ही में एक प्रेममहाकाव्य पढ़ने के दौरान जिंदगी के गूढ़ रहस्यों के अनुभव को समझने की कोशिस की इस प्रेममहाकाव्य का नाम है …’गीतों के बादल′ जोकि--- ''तुषार देवेन्द्र चौधरी ''द्वारा लिखित एवं संकलित है. … यह प्रेमकाव्यग्रन्थ इसलिए कहा जा सकता क्योंकि इस काव्यसंग्रह में जीवन भर के अनुभव और प्यार की तरुणाई से लबरेज शब्दों की मालाएं पिरोई गई है .. कहने के लिए यह कविता संग्रह है जोकि जीवन के अनुभवों पर केंद्रित . कवि की जिंदगी में होने वाली उथल-पुथल और संघर्ष को दर्शाता है . लेकिन मेरी नज़र में यह पूरी जिंदगी की गाथा होने के साथ प्यार के प्रतीक के रूप में अपने प्राणप्रिये को समर्पित सन्देश है . जिसको पढकर लोग अपने जीवन के अनुभव को महसूस करेंगे और एक-एक लाइन में होने वाले संघर्ष को जीना चाहेंगे ..कुछ लाइने पूरी जिंदगी को झकझोर देंगी जैसे .-----
. बादलों में, सागरों में ,सिर्फ तेरा ही उमड़ना ,
देखने की जिद हमें थी ,डूबकर तुझमें उतरना //
पूरे काव्य संग्रह में लिखी हर कविता में वो सब है जो एक साधारण कवि की कल्पना से अक्सर बाहर ही होता है .. जिंदगी भर के संघर्ष, प्यार,नफरत, और सहन शीलता की झलक इसमें..बिलकुल पारदर्शी - सी दिखाई देती है /
आप किताब की भूमिका पढेंगे तो आपको एकबारगी लगेगा कि यह किताब मात्र एकतरफा ही होगी जो कवि के जीवन को गौरवान्वित करने का प्रयत्न करेगी.. लेकिन आपको काव्य रचनायें पढते समय भूमिका को संग्रह से हटाना मुश्किल पड़ेगा.. क्योकि भूमिका में कवि ने अपने जीवन की उन घटनाओं का उल्लेख किया है जिसने हर हल , हर समय कवि के जीवन को झकझोर दिया है … यह किताब पढते वक्त आपको कवि के पूरे जीवन के अनुभव कि झलक दिखलाई पड़ेगी /खास बात यह है कि इस किताब को लिखने के काल एवं सारी घटनाओं को कलमबद्ध करते हुए कवि को अपने सुख-दुःख- प्यार-नफरत को पिरोते हुए तीन दशक लंबा वक्त लगा है…
यह किताब इतनी बेहतरीन इसलिए बन पाई है क्योकि इसकी रचना करते समय बहुत ही धैर्य रखा गया है.. तीन दशकों के धैर्य को पिरोती हुई यह किताब आधुनिक रचनाओं की द्रष्टि से अपनी मौलिकता में श्रेष्ठतम लगती है .. आज के कवियो की किताबें सिर्फ २-४ महीनों में ही लिखी जाती हैं इसीलिए वह प्रासंगिकता उनमे नहीं रह पाती जो इस किताब में है..कवितायें जीवन के ऊँचे -नीचे रास्तों पर शब्दों की ऊँगली थामे एक के बाद एक डग भरतीं नज़र आती है, पहला भाग ‘भीगे पथ पर’ की घटनाओं को तीन दशकों तक .... आगे बढाता है…लगता ही नहीं कि हम किसी किताब की अगली कड़ी पढ़ रहे है .. ‘गीतों के बादल′ जीवन के हर पहलू को जीवंत करतीं है ......
कैसे -कैसे स्वरुप हैं प्यार के, प्यार भरे संघर्ष के.. जो जीवन के चरित्र को रोमांचित कर देते हैं /.अभी तक मेरे द्वारा पढ़ी गई प्रेमकाव्यग्रंथों में से सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है यह / मेरी नज़र में यह निर्विवाद रूप से बेहद उम्दा काव्यग्रंथ है.. हम यह नहीं कह सकते कि कौन सी कविता ज्यादा अच्छी है.. और पढ़ना शुरू करने के बाद चाहकर भी हम इससे दूर नहीं भाग सकते . क्योकि इन कविताओ में जीवन का रोमांच छिपा हुआ है. ,/
मैंने इसे अपने ब्लॉग पर इसलिए भी लिखा है क्योकि मेरी नजर में जीवन के सुख-दुःख प्यार नफरत को कविताओं में माध्यम से जीवंत करने का
इससे बेहतर नजरिया हो ही नहीं सकता.. आखिर इसीलिए तो माना जाता है कि “जीवन एक संघर्ष” है जिससे जीत हासिल करना और जीत हासिल करके
भी न जीतना … जीवन से ही सीखना पड़ता है ..
संजय कुमार --
आप के हाथो में जादू है , आप की कृति अतुल्य है , देवेन्द्र जी माँ सस्वती आप को और भी शब्दों का अमृत बरसाने के लिए आशीष दे ...
चेतन रामकिशन ---
हमने तो आज तक महोदय की जितनी भी रचना पढ़ी हैं, सबने मन को भावों से, विधाओं से और सत्यता से जोड़ा है!
मुझ नवोदित ने उनके हर एक रचना से ज्ञान प्राप्त किया है! न मैं इन्हें शायर मात्र की संज्ञा दूंगा, न ही कवि की! मैं तो इन्हें पूर्ण साहित्यकार कहता हूँ, जो हर विधा में पारंगत हैं! नमन तुषार जी! "
आप के हाथो में जादू है , आप की कृति अतुल्य है , देवेन्द्र जी माँ सस्वती आप को और भी शब्दों का अमृत बरसाने के लिए आशीष दे ...
चेतन रामकिशन ---
हमने तो आज तक महोदय की जितनी भी रचना पढ़ी हैं, सबने मन को भावों से, विधाओं से और सत्यता से जोड़ा है!
मुझ नवोदित ने उनके हर एक रचना से ज्ञान प्राप्त किया है! न मैं इन्हें शायर मात्र की संज्ञा दूंगा, न ही कवि की! मैं तो इन्हें पूर्ण साहित्यकार कहता हूँ, जो हर विधा में पारंगत हैं! नमन तुषार जी! "
बुधवार, 30 नवंबर 2011
वस्तुत: ''तुषार जी '' भावों के चितेरे हैं /भावात्मक आरोह- अवरोह की अद्भुत सामर्थ्य है उनमें / वो उसे शब्दों में गूंथ कर जीवंत कर देते हैं /''गीतों के बादल' ' काव्य संग्रह मुझे एक मित्र द्वारा ,अकस्मात ही प्राप्त हुआ /इससे पहले मैं ''तुषार जी '' को नहीं जानता था / मगर जब उनके गीत पदे ,अवाक् रह गया /मैंने समीक्षा भी लिख दी / आप अंदाज लगा सकते हैं मैं कितना प्रभावित हो गया था /सच तो यह है ''तुषार जी' ' मन में उतर कर रह ही जाते हैं / उनका अपने गीतों के बारे में यह कथन ----
''अगर किसी का मन ये छू लें , इनकी कीमत मिल जायेगी ''
'' तुषार जी'' को शायद न पता हो मगर उनके गीत अमूल्य हैं /
''तुषार जी का या संग्रह इतना सहज, सरल, सुगम है कि इसमें ---सरसता-- जिसे हम एक 'श्रेष्ठ काव्य' की झांकी कह सकते हैं इस संग्रह के शब्द -शब्द में घुली हुई है /भाषा पर अलंकारो का अतिशय बोझ नहीं है /कहीं -कहीं ' 'मितवा ' ' मनवा ' आदि शब्दों का प्रयोग भाषा में आकर्षण का केंद्र बन जाता है/बाल्मीकि से लेकर कालिदास तक ,पन्त से लेकर निराला तक बहुत कुछ है ,मगर ''तुषार जी' की बात ही और है /उनके गीत या जीवन संगीत में भेद करना मेरे बस में नहीं /
हमारी ,तुम्हारी आत्मा एक है /हम दोनों में कौई फर्क नहीं है /फिर हमारे अलग होने का कोई मतलब ही नहीं है/मैं स्वर्ग में आकर तुम्हें प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
उन्हें तिनका -तिनका रोता प्रतीत होता है ,सुबह लुटी हुई ,शाम झुलसी हुई प्रतीत होती है /ख़ुशी का कहीं एक कतरा भी नहीं दिखाई देता /मगर हिम्मत है ,दिलासा है , अपने प्यार पर यकीन है /वो कहते हैं ----
बाकी हैं कुछ मेरी साँसें ,आऊँगा तेरे पास कभी,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी //
कवि इतने आँसू बहाकर भी हारा नहीं है /हताश नहीं है ,टूट चूका है मगर उदास नहीं है/ ' भवभूति ' के राम की करुणा , चाहे घनीभूत है वहाँ हताशा- निराशा है /राम सर्व शक्तिमान हैं /वे नियति और विधान तक बदलने की ताकत रखते हैं मगर सीता के वियोग में सोचते हैं -यह ह्रदय फट क्यों नहीं जाता ,इसके दो टुकड़े क्यों नहीं हो जाते /वो निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं /मगर 'तुषार' विक्षिप्त होते हुए भी तूफानों से लड़ते हैं /चिर -पतझड़ दोने के लिए तैयार हैं / कवि ने सिर्फ अविधा में भाव पिरोने का साहस किया है ,लक्षणा ,व्यंजना से परहेज /वो चाहता तो काव्य के शेष दो कारकों का इस्तेमाल कर सकता था मगर उसके भाव --
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----
''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई//
शोक- संतप्त कवि अपनी प्राण बल्लभा की स्मृति में यह संग्रह समर्पित करते हुए जब आकाश में बादलों की घटायें देखता है ,धरती पर समुन्दर के पानी को देखता है , उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है //
यह सम्पूर्ण संग्रह ...श्रंगार और करुण रस का एक मधु कलश है/कहीं सौन्दर्य की प्यास तो कहीं विरह की आग /कहीं मिलन की मधु - यामिनी तो कहीं वियोग का अंधकार / उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
यह संग्रह ३९ वर्षों के वैवाहिक जीवन की न सिर्फ दास्तान है बल्कि प्रकृति और प्रेम का एक साश्वत अभिलेख है /जीवन की कशमकश किसके साथ नहीं गुजरती लेकिन उसमें एक तना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है //
उर्वशी ...से भी अधिक सम्मोहन रखने वाली अपनी ...प्रियतमा के काल -कवलित हो जाने पर' तुषार जी ' की एकाकी ... छटपटाहट , जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/
''अगर किसी का मन ये छू लें , इनकी कीमत मिल जायेगी ''
'' तुषार जी'' को शायद न पता हो मगर उनके गीत अमूल्य हैं /
''तुषार जी का या संग्रह इतना सहज, सरल, सुगम है कि इसमें ---सरसता-- जिसे हम एक 'श्रेष्ठ काव्य' की झांकी कह सकते हैं इस संग्रह के शब्द -शब्द में घुली हुई है /भाषा पर अलंकारो का अतिशय बोझ नहीं है /कहीं -कहीं ' 'मितवा ' ' मनवा ' आदि शब्दों का प्रयोग भाषा में आकर्षण का केंद्र बन जाता है/बाल्मीकि से लेकर कालिदास तक ,पन्त से लेकर निराला तक बहुत कुछ है ,मगर ''तुषार जी' की बात ही और है /उनके गीत या जीवन संगीत में भेद करना मेरे बस में नहीं /
हमारी ,तुम्हारी आत्मा एक है /हम दोनों में कौई फर्क नहीं है /फिर हमारे अलग होने का कोई मतलब ही नहीं है/मैं स्वर्ग में आकर तुम्हें प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
उन्हें तिनका -तिनका रोता प्रतीत होता है ,सुबह लुटी हुई ,शाम झुलसी हुई प्रतीत होती है /ख़ुशी का कहीं एक कतरा भी नहीं दिखाई देता /मगर हिम्मत है ,दिलासा है , अपने प्यार पर यकीन है /वो कहते हैं ----
बाकी हैं कुछ मेरी साँसें ,आऊँगा तेरे पास कभी,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी //
कवि इतने आँसू बहाकर भी हारा नहीं है /हताश नहीं है ,टूट चूका है मगर उदास नहीं है/ ' भवभूति ' के राम की करुणा , चाहे घनीभूत है वहाँ हताशा- निराशा है /राम सर्व शक्तिमान हैं /वे नियति और विधान तक बदलने की ताकत रखते हैं मगर सीता के वियोग में सोचते हैं -यह ह्रदय फट क्यों नहीं जाता ,इसके दो टुकड़े क्यों नहीं हो जाते /वो निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं /मगर 'तुषार' विक्षिप्त होते हुए भी तूफानों से लड़ते हैं /चिर -पतझड़ दोने के लिए तैयार हैं / कवि ने सिर्फ अविधा में भाव पिरोने का साहस किया है ,लक्षणा ,व्यंजना से परहेज /वो चाहता तो काव्य के शेष दो कारकों का इस्तेमाल कर सकता था मगर उसके भाव --
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----
''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई//
शोक- संतप्त कवि अपनी प्राण बल्लभा की स्मृति में यह संग्रह समर्पित करते हुए जब आकाश में बादलों की घटायें देखता है ,धरती पर समुन्दर के पानी को देखता है , उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है //
यह सम्पूर्ण संग्रह ...श्रंगार और करुण रस का एक मधु कलश है/कहीं सौन्दर्य की प्यास तो कहीं विरह की आग /कहीं मिलन की मधु - यामिनी तो कहीं वियोग का अंधकार / उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
यह संग्रह ३९ वर्षों के वैवाहिक जीवन की न सिर्फ दास्तान है बल्कि प्रकृति और प्रेम का एक साश्वत अभिलेख है /जीवन की कशमकश किसके साथ नहीं गुजरती लेकिन उसमें एक तना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है //
उर्वशी ...से भी अधिक सम्मोहन रखने वाली अपनी ...प्रियतमा के काल -कवलित हो जाने पर' तुषार जी ' की एकाकी ... छटपटाहट , जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/
इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है //
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा //
और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी //
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से ...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा है /नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है / यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ---
-कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है //
तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /शिल्प-- सज्जा का ध्यान रखता है / कथन - एक मंच की तरह है /अलंकार व समास --आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है / जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं /
अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है --
तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा /
लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है / कवि जब निराशा के गहन -अंधकार में घिरता है ,उसकी स्याह चादर में अपने साथ
सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा ,
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी /
इस जगह पर कवि ने बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...
देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो //
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी
अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है /
वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के
बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है //
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा //
और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी //
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से ...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा है /नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है / यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ---
-कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है //
तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /शिल्प-- सज्जा का ध्यान रखता है / कथन - एक मंच की तरह है /अलंकार व समास --आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है / जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं /
अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है --
तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा /
लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है / कवि जब निराशा के गहन -अंधकार में घिरता है ,उसकी स्याह चादर में अपने साथ
सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा ,
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी /
इस जगह पर कवि ने बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...
देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो //
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी
अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है /
वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के
बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली
Manorma Mishra --main to dekhakar dang rah jati hun ki .jindagi ke har ahassas ko itni khoobsoorti se shabdo me kaise pirote hain aap...
Navin C. Chaturvedi---
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
Navin C. Chaturvedi---
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
Anand Pandey ----wonderful! Hum to samjhe the ki ashkon ki kishten chuk gayeen-- Par raat ek tasweer ne phir se taqaja kar diya.
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन /.......मैं अभी भी ’गीतों के बादल’ को फाहा-फाहा जी रहा हूँ. आपकी सोच के लालित्य और आपकी लेखिनी के संगीतमय प्रवाह में खूब डूब-उतरा रहा हूँ. इस पर विस्तार से साझा करूँगा. अभी कुछ समय और-और बहने दें./
Navin C. Chaturvedi आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' बार बार पढ़ रहा हूँ, वाह क्या गीत हैं, आनंद आ रहा है| एक तो मुंबई में वर्षा और उस पर आप के गीतों की रिमझिम,
Toshlendra Pandya-- sir, whether I think your the person who coming on earth to give colours in people blank life.....we need your regular colourful coments to enjoy the beautiful world of God.....
N.p. Jadaun Singh--- ,aapke dwara , AAPKE KAR KAMLON DWARA RACHIT PUSTAK "GEETON KE BAADAL " MUJHE MILI , AAPKI RACHNAON ME EK- EK SHABD SE SHINGAR RAS TAPAKTA HAI, AAP HUM JAISE KARORON PAATHKO KA MAN MOHTE RAHEN. AAPKO BAHUT- BAHUT BADHAIYA ISS SANSKARAN KE LIYE AUR DHANYAVAAD. NARENDRA SINGH JADAUN
Pawan Kumar --Thank you So Much Sir ji..!! Thank you sooo Very much....!! For sending me Your so Beautiful Creation...!! I Love those songs in that book "GEETON kE BAADAL" very much..!!
Subhash Sharma--- Aapke ye--' geeton ke badal ' hi nahi hain-- inmai samudar se bhi jyada gahrai hai.- Aakhen bahut rokne par bhi- gili ho jati hain. Aap ke liye hamare pas shabd nahi hain.-- Aapka Pathak.
Neeraj Tripathi--- ये तुषार के 'गीतों के बादल' हैं,
इनसे पार और कहाँ जाओगे,
इस जीवन की अथाह गर्मी में'
सारी नमी यही पाओगे
Anurag Jagdhari---------
असल ज़िन्दगी में ना जाने कितने झंझावातों से पार हुए हैं आप!सोचता हूँ ना जाने कैसे आप इन सब हालातों में भी कविता करते रहे.खैर दर्द भी कविता को जन्म देता है.अभी कुल जमा 14 कवितायेँ पढ़ी हैं.आप इन हालातों में भी कैसे इतना सृजन कर पाए,आश्चर्य होता है.शेष फिर ..........
Sarita Upadhyaya --तुषार जी ,
नमस्कार |
मैं बहुत दिनों से सोच रही थी की आपसे कहूँ न जाने क्यों साहस न जुटा पाई ,आज कह ही रही हूँ मैं भी आपकी पुस्तक ''गीतों के बादल ''को पढ़ने की बड़ी इच्छुक हूँ पार समस्या ये है की वर्तमान में, मैं इस्राएल में हूँ सो नहीं जानती आपसे कैसे कहूँ पुस्तक प्राप्त करने को ;क्या ये पुस्तक नेट प़र उपलब्ध है ---कृपया बताएं |
unluckly devendar ji , jab aapki pustak mili, main , bahut beemar hu. hospital me hu.bas lete -lete abhi bhumika hi padhi hai . man sochane par vivash ho gaya ki kabhi -kabhi insaan ke saath kuchh na kuchh aisa ghatata rahata hai jisaki use ummeed nahi hoti..sab kuchh aakankhaoon se pare hota hai... jaise kuchh aapke saath hua.....
bahut prerna mili mujhe aapse ki insaan ko himmat nahi khona chahiye .
R.k. Gupta ---तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आ गई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
Anand Pandey ----wonderful! Hum to samjhe the ki ashkon ki kishten chuk gayeen-- Par raat ek tasweer ne phir se taqaja kar diya.
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन /.......मैं अभी भी ’गीतों के बादल’ को फाहा-फाहा जी रहा हूँ. आपकी सोच के लालित्य और आपकी लेखिनी के संगीतमय प्रवाह में खूब डूब-उतरा रहा हूँ. इस पर विस्तार से साझा करूँगा. अभी कुछ समय और-और बहने दें./
Navin C. Chaturvedi आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' बार बार पढ़ रहा हूँ, वाह क्या गीत हैं, आनंद आ रहा है| एक तो मुंबई में वर्षा और उस पर आप के गीतों की रिमझिम,
Toshlendra Pandya-- sir, whether I think your the person who coming on earth to give colours in people blank life.....we need your regular colourful coments to enjoy the beautiful world of God.....
N.p. Jadaun Singh--- ,aapke dwara , AAPKE KAR KAMLON DWARA RACHIT PUSTAK "GEETON KE BAADAL " MUJHE MILI , AAPKI RACHNAON ME EK- EK SHABD SE SHINGAR RAS TAPAKTA HAI, AAP HUM JAISE KARORON PAATHKO KA MAN MOHTE RAHEN. AAPKO BAHUT- BAHUT BADHAIYA ISS SANSKARAN KE LIYE AUR DHANYAVAAD. NARENDRA SINGH JADAUN
Pawan Kumar --Thank you So Much Sir ji..!! Thank you sooo Very much....!! For sending me Your so Beautiful Creation...!! I Love those songs in that book "GEETON kE BAADAL" very much..!!
Subhash Sharma--- Aapke ye--' geeton ke badal ' hi nahi hain-- inmai samudar se bhi jyada gahrai hai.- Aakhen bahut rokne par bhi- gili ho jati hain. Aap ke liye hamare pas shabd nahi hain.-- Aapka Pathak.
Neeraj Tripathi--- ये तुषार के 'गीतों के बादल' हैं,
इनसे पार और कहाँ जाओगे,
इस जीवन की अथाह गर्मी में'
सारी नमी यही पाओगे
Anurag Jagdhari---------
असल ज़िन्दगी में ना जाने कितने झंझावातों से पार हुए हैं आप!सोचता हूँ ना जाने कैसे आप इन सब हालातों में भी कविता करते रहे.खैर दर्द भी कविता को जन्म देता है.अभी कुल जमा 14 कवितायेँ पढ़ी हैं.आप इन हालातों में भी कैसे इतना सृजन कर पाए,आश्चर्य होता है.शेष फिर ..........
Sarita Upadhyaya --तुषार जी ,
नमस्कार |
मैं बहुत दिनों से सोच रही थी की आपसे कहूँ न जाने क्यों साहस न जुटा पाई ,आज कह ही रही हूँ मैं भी आपकी पुस्तक ''गीतों के बादल ''को पढ़ने की बड़ी इच्छुक हूँ पार समस्या ये है की वर्तमान में, मैं इस्राएल में हूँ सो नहीं जानती आपसे कैसे कहूँ पुस्तक प्राप्त करने को ;क्या ये पुस्तक नेट प़र उपलब्ध है ---कृपया बताएं |
unluckly devendar ji , jab aapki pustak mili, main , bahut beemar hu. hospital me hu.bas lete -lete abhi bhumika hi padhi hai . man sochane par vivash ho gaya ki kabhi -kabhi insaan ke saath kuchh na kuchh aisa ghatata rahata hai jisaki use ummeed nahi hoti..sab kuchh aakankhaoon se pare hota hai... jaise kuchh aapke saath hua.....
bahut prerna mili mujhe aapse ki insaan ko himmat nahi khona chahiye .
R.k. Gupta ---तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आ गई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
मंगलवार, 29 नवंबर 2011
Niya Ashok --TUSHAR JI --AAJ OFFICE MEN .. AAPKI "GEETON KE BADAL"MILI BAHUT ACCHA LAGA.. BHUMIKA HI PAD KR ..ANKHEN GILI HO GYN... BAHUT MAZBOOT INSAAN HAIN .. AAP ..JO ITNA DUKH SAHKAR BHI JEEVAN KA SANTULAN BANAYE HUE HAIN ....ITNE MUSHKIL DAUR MEN ...AAPNE ITNA UMDA LIKHA HAI.....AAP BAHUT MAHAN HAIN...
Kavi Deep Tadiya--- but light is ever same ....like you
Sanjay Kumar--- Tushar ji ,aap ki likhi har pankti men ek nayi soch hoti hai...
चेतन रामकिशन ---शानदार पंक्तियाँ,शानदार आह्वान,आपके सोहार्द पूर्ण, जोश पूर्ण साहित्य को नमन!
Kunwar Ajeet Singh Baghel ---Tushar Ji ,Aapki Kaviytaon ko padhkar lagta hai ki bas sab kuchh chodkar padhte hi raho .
Asha Pandey Ojha Asha ---bahut sundar ,bahut utsaah vardhk
Vijai K Singh--- Aapke paas kavya ki amulya nidhi jo hai ! ! !
Sanjay Kumar--- Tushar ji ,aap ki likhi har pankti men ek nayi soch hoti hai...
चेतन रामकिशन ---शानदार पंक्तियाँ,शानदार आह्वान,आपके सोहार्द पूर्ण, जोश पूर्ण साहित्य को नमन!
Kunwar Ajeet Singh Baghel ---Tushar Ji ,Aapki Kaviytaon ko padhkar lagta hai ki bas sab kuchh chodkar padhte hi raho .
Asha Pandey Ojha Asha ---bahut sundar ,bahut utsaah vardhk
Vijai K Singh--- Aapke paas kavya ki amulya nidhi jo hai ! ! !
Praveen Kumar--- nice lines sir ..........
Vasundhara Pandey ---beautiful sir
Rajesh Kumar Dubey ---हद है दिवानगी की ..वाह वाह
चेतन रामकिशन- आपकी ओजस्वी रचन्नाओं पर कुछ कमेन्ट करने के लिए शब्द ही नहीं मिल पते! बहुत अनमोल रचना!
Neeraj Tripathi- मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है , adbhut
Amit Tyagi-- bahut sundar...tushar ji
Vasundhara Pandey ---beautiful sir
Rajesh Kumar Dubey ---हद है दिवानगी की ..वाह वाह
चेतन रामकिशन- आपकी ओजस्वी रचन्नाओं पर कुछ कमेन्ट करने के लिए शब्द ही नहीं मिल पते! बहुत अनमोल रचना!
Neeraj Tripathi- मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है , adbhut
Amit Tyagi-- bahut sundar...tushar ji
Sanjay Kumar---क्या कहने आप के सर जी आपकी लेखनी जादू है , आप का जबाब नहीं मैं आप का एक अदना सा प्रसंसक हूँ /
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
आनंद पाण्डेय ----आश्चर्यजनक,हम तो समझे थे कि अश्कों की किश्तें चुक गईं ---पर रात इक तस्वीर ने फिर से तगाजा कर दिया /
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन ....
Neeraj Tripathi-- awesum sir...laajwaab...shringaar ras se labalab
Dinesh Verma ........
आदरणीय , हमें नहीं पता था कि आपका जीवन अनेक झंझावतों से गुजर चुका है... हम इस बात से भी अनभिज्ञ थे कि आदरणीया आपसे दूर जा चुकी हैं.. इन परेशानियों के सागर में डूबते-उतराते आपने जो सृजित किया है.. वह अमूल्य है... मैंने ''गीतों के बादल से '' कुछ बूँदें पंदह मिनट में पायी हैं,, ये बूंदे मुझे स्वाति की तरह लगी.. अब आपकी यह कृति मेरे लिए धरोहर तो है ही... दिशा निर्देशन का कार्य भी करेगी.... आभारी हूँ आपका.. जो मुझे इस लायक समझा.......
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
आनंद पाण्डेय ----आश्चर्यजनक,हम तो समझे थे कि अश्कों की किश्तें चुक गईं ---पर रात इक तस्वीर ने फिर से तगाजा कर दिया /
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन ....
Neeraj Tripathi-- awesum sir...laajwaab...shringaar ras se labalab
Dinesh Verma ........
आदरणीय , हमें नहीं पता था कि आपका जीवन अनेक झंझावतों से गुजर चुका है... हम इस बात से भी अनभिज्ञ थे कि आदरणीया आपसे दूर जा चुकी हैं.. इन परेशानियों के सागर में डूबते-उतराते आपने जो सृजित किया है.. वह अमूल्य है... मैंने ''गीतों के बादल से '' कुछ बूँदें पंदह मिनट में पायी हैं,, ये बूंदे मुझे स्वाति की तरह लगी.. अब आपकी यह कृति मेरे लिए धरोहर तो है ही... दिशा निर्देशन का कार्य भी करेगी.... आभारी हूँ आपका.. जो मुझे इस लायक समझा.......
सोमवार, 21 नवंबर 2011
कविता नवरसों से अपना श्रृंगार करती है /काव्य शिल्प उसे आकार देता है /भावनायें उसे झंकार देती हैं /शब्द संयोजन उसे अभिव्यक्ति देता है /मगर आधुनिक कवि, कविता को विकार के सिवा कुछ नहीं देता /वो कहता है यह उसका नवीनतम अविष्कार है / न जाने कितने प्रयोग वो कर चुका है अब तो हाइकू भी कविता का पर्याय बन चुका है /
शनिवार, 29 अक्टूबर 2011
रविवार, 9 अक्टूबर 2011
राजीव गाँधी के मंत्री मंडल में बी. पी. सिंह बित्त मंत्री ,उसके बाद रक्षा मंत्री बने /उन्हें विरोधी दलों की ओर से राजीव के खिलाफ वगावत करने का लालच दिया जा रहा था /जब वो रक्षा मंत्री थे १४०० करोड़ का बोफोर्स गन सौदा हुआ था /रक्षा सौदे दुनिया में कहीं भी बिना दलाली के नहीं होते /लगभग ६० करोड़ देने पड़े /मगर राजीव पर अभियोग लगवा दिया कि ये दलाली वो खा गए /विपक्षी दल जो चाहते थे राजा ने राजीव के साथ विश्वासघात करके उनकी डूबी हुई साख को जीवित कर दिया /नेहरु वंश पर देश के साथ दलाली का यह अभियोग मुझे तीर की तरह लगा / राजा ने राजीव की पीठ में छुरा भोंक दिया/
'' प्रेस विज्ञप्ति ''
आज दिनांक ९-१०-२०११ को साहित्यिक संस्था ''काव्य -शिल्पी '' के तत्वावधान में , संयोजक श्री देवेन्द्र चौधरी '' तुषार '' के निवास स्थान वैशाली ,गाजियाबाद पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया / अनेक जाने -माने कवियों ने गोष्ठी में भाग लेकर रस विभोर कर दिया /श्रोता झूम उठे /गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार महेश सक्सेना ने की तथा संचालन डा ० जय शंकर शुक्ल ने किया / गोष्ठी में भाग लेने वाले कवियों में मोहन द्विवेदी ,संजय शुक्ल ,नीतू तोमर ,अनित्य नारायण मिश्र ,रुस्तम सिंह लोधी प्रमुख रहे / मोहन द्विवेदी हास्य व्यंग के राष्ट्रीय स्तर के कवि हैं /उनकी रचनाओं में पाकिट [जेब] से सम्बंधित रचना आदमी की आर्थिक मनोदशा को इतनी गहराई से उतारती रही जिसने एक आम आदमी की आर्थिक हालत और सोच को जीवंत कर दिया / 'तुषार' का गीत ''मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,अभी तुम्हारी आँखों से ये बाहर ही कब निकली है '', मन को छूकर निकल गया / सभी कवियों ने गीतों , गजलों दोहों से संगोष्ठी को एक नयी ऊँचाई दी / कार्यक्रम इतना सफल रहा जिसे भूल पाना कठिन है /
आज दिनांक ९-१०-२०११ को साहित्यिक संस्था ''काव्य -शिल्पी '' के तत्वावधान में , संयोजक श्री देवेन्द्र चौधरी '' तुषार '' के निवास स्थान वैशाली ,गाजियाबाद पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया / अनेक जाने -माने कवियों ने गोष्ठी में भाग लेकर रस विभोर कर दिया /श्रोता झूम उठे /गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार महेश सक्सेना ने की तथा संचालन डा ० जय शंकर शुक्ल ने किया / गोष्ठी में भाग लेने वाले कवियों में मोहन द्विवेदी ,संजय शुक्ल ,नीतू तोमर ,अनित्य नारायण मिश्र ,रुस्तम सिंह लोधी प्रमुख रहे / मोहन द्विवेदी हास्य व्यंग के राष्ट्रीय स्तर के कवि हैं /उनकी रचनाओं में पाकिट [जेब] से सम्बंधित रचना आदमी की आर्थिक मनोदशा को इतनी गहराई से उतारती रही जिसने एक आम आदमी की आर्थिक हालत और सोच को जीवंत कर दिया / 'तुषार' का गीत ''मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,अभी तुम्हारी आँखों से ये बाहर ही कब निकली है '', मन को छूकर निकल गया / सभी कवियों ने गीतों , गजलों दोहों से संगोष्ठी को एक नयी ऊँचाई दी / कार्यक्रम इतना सफल रहा जिसे भूल पाना कठिन है /
शनिवार, 8 अक्टूबर 2011
आपरेशन ब्लू स्टार से लेकर इंदिरा की शहादत तक और उसके बाद की हिंसक घटनायें अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण थीं /राजीव गाँधी को इंदिरा की शहादत के कारण अपार सहानुभूति मिली / पूरा देश उनका गम भुलाने के लिए राजीव को सीने से चिपकाना चाहता था /३१ अक्तूबर को प्रधान मंत्री बन गये /चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला /लोकसभा में ४११/५४२ सीट मिलीं /चुनाव प्रचार में वो चंदौसी आये थे / बी.पी. सिंह साथ थे /लगभग एक लाख लोग या चंदौसी की आधी आबादी उन्हें सुनने -देखने के लिए पहूँची /
मैं भी गया था /बी.पी.सिंह ने राजीव का परिचय प्रधान मंत्री योग्य राजकुमार के रूप में कराया /राजीव ने बहुत . ही नपे तुले शब्दों में अपना भाषण दिया /वो इतने मनमोहक लग रहे थे जैसे राम का अवतार प्रत्यक्ष में सामने हो /जनता उन्हें देखती ही रह गयी /
मैं भी गया था /बी.पी.सिंह ने राजीव का परिचय प्रधान मंत्री योग्य राजकुमार के रूप में कराया /राजीव ने बहुत . ही नपे तुले शब्दों में अपना भाषण दिया /वो इतने मनमोहक लग रहे थे जैसे राम का अवतार प्रत्यक्ष में सामने हो /जनता उन्हें देखती ही रह गयी /
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
१९८० तक आते -आते लोग राष्ट्रीय -एकता का मतलब समझने लगे थे / लोगों के मन में छोटे -मोटे डर तो थे ,कहीं जातिबाद पर , बहुसंख्यक ,अल्पसंख्यक पर ,क्षेत्रीय आस्तित्व पर चिंगारी न सुलग उठे मगर सच तो यह था पूरा देश राष्ट्र की मुख्य धारा में समां चुका था /डर होते हुए भी हिंदुस्तान हम सब का प्यारा वतन बन चुका था / हम सब भारत वासी इस मुल्क को अपना मुल्क समझने लगे थे / ऐसे में खालिस्तान का आन्दोलन कुछ सिख मिलिटेंट्स ने चलाकर पूरे देश को सकते में डाल दिया / सरकार की रातों की नींद उड़ गई /काफी प्रयास किये गए शांति से समस्या का हल निकल आये /मगर जितनी दवा की मर्ज उतना ही बदता गया / आखिर १९८४ में ब्लू -स्टार -आप्रेशन का फैसला लिया गया /बहुत
साबधानी से कार्रवाई करनी थी ,जान माल का कोई नुकसान न हो / मगर काउंटर विरोध के कारण नुकसान हुआ / आन्दोलन लगभग समाप्त हो गया /प्रतिक्रिया में ३१ अक्टूबर१९८४ के दिन इंदिरा गाँधी के अंगरक्क्षों ने उन्हें गोलियों से भून डाला /
साबधानी से कार्रवाई करनी थी ,जान माल का कोई नुकसान न हो / मगर काउंटर विरोध के कारण नुकसान हुआ / आन्दोलन लगभग समाप्त हो गया /प्रतिक्रिया में ३१ अक्टूबर१९८४ के दिन इंदिरा गाँधी के अंगरक्क्षों ने उन्हें गोलियों से भून डाला /
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011
जनवरी १९८० में जनता दल की विफलता तथा आपसी फूट के कारण चुनाव हुए /इंदिरा गाँधी की एक बार फिर धमाकेदार बापसी हुई /जनतादल १७२ सीट से लुदककरकुल ३१ सीट पर आ गया /केंद्र में अब इंदिरा कांग्रेस या कांग्रेस आई की मजबूत सरकार सिंहासन पर थी/ मगर 'खालिस्तान आन्दोलन' ने इंदिरा को चैन से बैठने न दिया /भारत के लोगों को सिक्खों से बेहद प्यार था ,उनकी बहादुरी की कद्र की जाती थी / मगर यह कैसा अप्प्रयाशित आन्दोलन छिड़ा सभी सकते में थे /सिख पूरे भारत में फैले हुए थे /खुश थे /मगर पंजाब में नाखुश /
मोरारजी जितने योग्य अर्थशास्त्री थे ,विद्वान तथा सरल इन्सान थे ,लोकप्रिय भी थे उतने ही कमजोर प्रधान मंत्री साबित हुए /जगजीवन राम डिप्टी पी. एम ,अटलविहारी बाजपेयी विदेश मंत्री .....सब प्रधानमंत्री की रेस में चोधरी चरणसिंह आदि के बीच मोरारजी भाई कहाँ खड़े थे उन्हें खुद पता नहीं था /निराश होकर जुलाई १९७९ में इस्तीफ़ा दे दिया / उनकी जगह चरणसिंह को छह महीने के लिए काम चलाऊ पी.एम .बनाया गया /संयुक्त जनता दल ताश के पत्तों की तरह बिखर गया /उधर इंदिरा गाँधी की बदती लोकप्रियता से भी सिंहासन हिलने लगा/
आपातकाल के बाद जनवरी १९७७ में चुनाव हुए /जे. पी. आन्दोलन जो इंदिरा हटाओ ,सम्पूर्ण क्रांति या सत्ता पर नेहरु वंश का एकाधिकार हटाने का आन्दोलन था कुछ हद तक सफल हुआ / जिसके लिए हिंदुस्तान का ,पूरा विपक्ष ऐड़ी से चोटी का जोर लगाकर कूदा था /इंदिरा गाँधी सड़क पर थीं , बिपक्ष सिंहासन पर /मोरारजी भाई संयुक्त जनता दल के प्रधानमंत्री बने /इंदिरा गाँधी को कदम -कदम पर घसीटा गया ,जेल भेजा गया /जनता की सहानुभूति बापस उनके प्रति गहराने लगी /जनता दल बिखरने लगा / उनका हर नेता प्रधानमंत्री की रेस में था /
बुधवार, 5 अक्टूबर 2011
लेकिन आपातकाल में इंदिरा तथा विपक्ष के बीच जो घमासान चल रहा था देखने लायक था ,सोचने लायक था /एक लाख चालीस हजार लोग आन्दोलन में जेल गए / विद्रोह की लपटें इक्कीस महीने तक ,जब तक आपातकाल लागू रहा सुलगतीं रहीं /संजय गाँधी का हस्तक्षेप विवादास्पद रहा / इंदिरा की छवि को उससे कितना नुकसान पहुंचा ,बताना मुश्किल है / इंदिरा के बीस सूत्री कार्यक्रम को कितनी सफलता मिली सरकार को पता होगा /आखिर आपातकाल बापस लिया गया /चुनाव घोषित हो गए/
इंदिरा गाँधी जिन कार्यक्रमों को लेकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रहीं थीं ,विपक्ष के आन्दोलन से भारी नुकसान हो सकता था /युद्ध के बाद देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था /वो कृषि और औद्योगिक विकास के लिए बीससूत्री योजना लेकर आयीं / तेल संकट बढ गया था / यदि आपातकाल न लगाया जाता तो संकट संभाले नहीं संभलता / बिपक्ष सत्ता परिवर्तन की जिद में देशव्यापी विद्रोह तथा सरकारी मशीनरी को कामकाज ठप्प करने के लिए उकसा रहा था /
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011
१९७५ से इंदिरा गाँधी के लोम हर्षक दिन शुरू हो गए / इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उनका चुनाव अवैध ठहरा दिया /राजनारायण की रिट स्वीकार हो गई /विपक्ष को उनपर हमले तेज करने का अचूक अवसर मिल गया /जयप्रकाश नारायण का सहयोग उनकी छवि फायदे का सौदा बन गया / जयप्रकाश जी ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया /इंदिरा को आपातकाल लगाने का मौका मिल गया /जयप्रकाश , अटल बिहारी ,अडवाणी ,चरणसिंह जैसे नेता जेल में भर दिए गए /मेरी द्रष्टि में दोनों पक्ष अपनी जगह ठीक थे ,जो कुछ हुआ देश के भले के लिए हुआ /.....
बंगला देश की आजादी के परिणाम स्वरुप -९०००० पाकिस्तानी युद्ध बंदी भारत की जेलों में कैद हो गए / इंदिरा गाँधी तथा जुल्फकार अली भुट्टो के बीच जुलाई १९७२ में शिमला समझौता हुआ /पाकिस्तान ने बंगला देश को राजनीतिक मान्यता दी /कैदी रिहा किये गए / भविष्य में उप महाद्वीप में शांति स्थापित करने के लिए कई उपायों को लागू करने की बचन बध्यता प्रगट की गयी/इस समय इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता शीर्ष पर थी /अटल बिहारी बाजपेयी ने उन्हें दुर्गा का अवतार बताया /
सोमवार, 3 अक्टूबर 2011
१९७१ तक तथा इंदिरा गाँधी काफी अनुभव चुनौतियों से गुजर चुकीं थीं /बंगलादेश अशांत था / पश्चिमी पाकिस्तान ,पूर्वी पाकिस्तान पर
जुल्म बरपा रहा था / बंगला देश, शेख मुजीबुर रहमान की अगुआई में आजादी की जंग के लिए तैयार बैठा था /लाखों बंगला देशी भारत के शरणार्थी
शिविरों में पनाह ले चुके थे /मुक्ति बाहिनी की भूमिका में भारत का योगदान इंदिरा गाँधी का ऐतिहासिक कदम था जिसने पाकिस्तान का बंटवारा कर दिया /.....i
जुल्म बरपा रहा था / बंगला देश, शेख मुजीबुर रहमान की अगुआई में आजादी की जंग के लिए तैयार बैठा था /लाखों बंगला देशी भारत के शरणार्थी
शिविरों में पनाह ले चुके थे /मुक्ति बाहिनी की भूमिका में भारत का योगदान इंदिरा गाँधी का ऐतिहासिक कदम था जिसने पाकिस्तान का बंटवारा कर दिया /.....i
रविवार, 2 अक्टूबर 2011
इंदिरा गाँधी और ,मोरारजी देसाई के बीच भारी टकराव था /कांग्रेस का एक धड़ा मोरारजी के पक्ष में था / मोरारजी बित्त्मंत्री रह चुके थे /योग्य समझे जाते थे /
इंदिरा जी गूंगी गुडिया के नाम से जानी जातीं थीं / यह तय करना कोई मुश्किल नहीं था कि किसे महत्त्व दिया जाए / दोनों के बीच जीत इंदिरा की हुई /
इदिरा ने बेंकों का एक झटके में ही राष्ट्रीयकरण कर डाला / देश ने उनका यह कदम खुले दिल से स्वीकार किया /मोरारजी की छवि धूमिल होने लगी /......
इंदिरा जी गूंगी गुडिया के नाम से जानी जातीं थीं / यह तय करना कोई मुश्किल नहीं था कि किसे महत्त्व दिया जाए / दोनों के बीच जीत इंदिरा की हुई /
इदिरा ने बेंकों का एक झटके में ही राष्ट्रीयकरण कर डाला / देश ने उनका यह कदम खुले दिल से स्वीकार किया /मोरारजी की छवि धूमिल होने लगी /......
शास्त्री जी पर देश कुछ ज्यादा ही विश्वास कर बैठा /ऐसी कोई बात नहीं थी /उनके जाने के बाद इंदिरा को लाया गया /लाने के लिए कुछ बचा ही न था / एक रिस्क
के रूप में उन्हें पेश कर दिया गया /उनका पहला भाषण बरेली में मैंने सुना /उन्हें कुछ बोलना नहीं आता था / मैं हैरान था क्या यह नेहरु की बेटी हैं / पंद्रह मिनट में
यह पता चल गया वो कुछ भी नहीं जानती हैं उन्हें जबरदस्ती प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है /.....
के रूप में उन्हें पेश कर दिया गया /उनका पहला भाषण बरेली में मैंने सुना /उन्हें कुछ बोलना नहीं आता था / मैं हैरान था क्या यह नेहरु की बेटी हैं / पंद्रह मिनट में
यह पता चल गया वो कुछ भी नहीं जानती हैं उन्हें जबरदस्ती प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है /.....
नेहरु के जीवनकाल में ही यह चर्चा शुरू हो गयी थी --नेहरु के बाद कौन ..?आखिर भारत कौन संभालेगा ..? शास्त्री जी ,पाकिस्तान से युद्ध कर के चले गए या
पाकिस्तान ,नेहरु के बाद इस हमले को एक अवसर समझ कर भारत से युद्ध कर बैठा /युद्ध बहुत मौके का हुआ /चीन के साथ भी युद्ध बहुत मौके का था / इन दोनों
युद्धों ने एशियाई महाद्वीप में एक शांतिपूर्ण भविष्य की नींव रख दी /तीनों पड़ौसी मुल्कों को कई मानों में आगाह कर दिया कि युद्ध विध्वंस के सिवा कुछ नहीं कर सकता /....
पाकिस्तान ,नेहरु के बाद इस हमले को एक अवसर समझ कर भारत से युद्ध कर बैठा /युद्ध बहुत मौके का हुआ /चीन के साथ भी युद्ध बहुत मौके का था / इन दोनों
युद्धों ने एशियाई महाद्वीप में एक शांतिपूर्ण भविष्य की नींव रख दी /तीनों पड़ौसी मुल्कों को कई मानों में आगाह कर दिया कि युद्ध विध्वंस के सिवा कुछ नहीं कर सकता /....
रविवार, 28 अगस्त 2011
मेरे सपनों का ये भारत कुछ तो अन्ना में दीखा है,
इतिहास बदलता दीखा है इन्सान उभरता दीखा है ,
आन्दोलन की उपलब्धि कम नहीं थी ,नौकरशाही , लोकशाही ,न्याय व्यवस्था का लचीलापन ,आम आदमी के प्रति बेरुखी और भ्रष्टाचार का बोलबाला ,
सबके ऊपर करारा प्रहार था /सरकार की नींद खुली /जनता का शांतिपूर्ण प्रदर्शन अभूतपूर्व था /
..............''.तुषार'' देवेन्द्र चौधरी ,वैशाली ,गाजियाबाद
इतिहास बदलता दीखा है इन्सान उभरता दीखा है ,
आन्दोलन की उपलब्धि कम नहीं थी ,नौकरशाही , लोकशाही ,न्याय व्यवस्था का लचीलापन ,आम आदमी के प्रति बेरुखी और भ्रष्टाचार का बोलबाला ,
सबके ऊपर करारा प्रहार था /सरकार की नींद खुली /जनता का शांतिपूर्ण प्रदर्शन अभूतपूर्व था /
..............''.तुषार'' देवेन्द्र चौधरी ,वैशाली ,गाजियाबाद
मंगलवार, 16 अगस्त 2011
यह आन्दोलन देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ध्वस्त न कर दे /सरकार पर बाहर से दबाव -- भविष्य में किसी भी निर्वाचित सरकार को काम नहीं करने देगा /
सरकार को जिस तरह ---ब्लेक मेल किया जा रहा है , --देश बिखर जाएगा /सरकार लोकपाल पर बिचार कर रही है / अन्ना, अनशन से धमका कर लोकपाल बनाना चाहते हैं /
सरकार को नीचा दिखाना चाहते हैं / उसे अंग्रेजों की सरकार ,खुद को गाँधी साबित करने का तमाशा बना रहे हैं / बच्चे गुमराह हो जाते हैं /--- वन्दे मातरम /
सरकार को जिस तरह ---ब्लेक मेल किया जा रहा है , --देश बिखर जाएगा /सरकार लोकपाल पर बिचार कर रही है / अन्ना, अनशन से धमका कर लोकपाल बनाना चाहते हैं /
सरकार को नीचा दिखाना चाहते हैं / उसे अंग्रेजों की सरकार ,खुद को गाँधी साबित करने का तमाशा बना रहे हैं / बच्चे गुमराह हो जाते हैं /--- वन्दे मातरम /
शनिवार, 13 अगस्त 2011
''तुषार जी का या संग्रह इतना सहज, सरल, सुगम है कि इसमें ---सरसता-- जिसे हम एक 'श्रेष्ठ काव्य' की झांकी कह सकते हैं इस संग्रह के शब्द -शब्द में घुली हुई है /भाषा पर अलंकारो का अतिशय बोझ नहीं है /कहीं -कहीं ' 'मितवा ' ' मनवा ' आदि शब्दों का प्रयोग भाषा में आकर्षण का केंद्र बन जाता है/बाल्मीकि से लेकर कालिदास तक ,पन्त से लेकर निराला तक बहुत कुछ है ,मगर ''तुषार जी' की बात ही और है /उनके गीत या जीवन संगीत में भेद करना मेरे बस में नहीं /....[.समीक्षा ]
हमारी ,तुम्हारी आत्मा एक है /हम दोनों में कौई फर्क नहीं है /फिर हमारे अलग होने का कोई मतलब ही नहीं है/मैं स्वर्ग में आकर तुम्हें
प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें
सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
..[.समीक्षा ]
प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें
सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
..[.समीक्षा ]
उन्हें तिनका -तिनका रोता प्रतीत होता है ,सुबह लुटी हुई ,शाम झुलसी हुई प्रतीत होती है /ख़ुशी का कहीं एक कतरा भी नहीं दिखाई देता /मगर हिम्मत है ,दिलासा है , अपने प्यार पर यकीन है /वो कहते हैं ---- --------------------------------------------बाकी हैं कुछ मेरी साँसें ,आऊँगा तेरे पास कभी,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी ,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी ,
कवि ने सिर्फ अविधा में भाव पिरोने का साहस किया है ,लक्षणा ,व्यंजना से परहेज /वो चाहता तो काव्य के शेष दो कारकों का इस्तेमाल कर सकता था मगर उसके भाव --
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी
कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई''.....[.समीक्षा ]
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी
कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई''.....[.समीक्षा ]
गुरुवार, 11 अगस्त 2011
शोक- संतप्त कवि अपनी प्राण बल्लभा की स्मृति में यह संग्रह समर्पित करते हुए जब आकाश में बादलों की घटायें देखता है ,धरती पर समुन्दर के पानी को देखता है ,
उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है,''....[.समीक्षा ]
उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है,''....[.समीक्षा ]
बुधवार, 10 अगस्त 2011
यह सम्पूर्ण संग्रह ...श्रंगार और करुण रस का एक मधु कलश है/कहीं सौन्दर्य की प्यास तो कहीं विरह की आग /कहीं मिलन की मधु - यामिनी तो कहीं वियोग का अंधकार /
उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत
जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
..............[समीक्षा ]
उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत
जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
..............[समीक्षा ]
यह संग्रह ३९ वर्षों के वैवाहिक जीवन की न सिर्फ दास्तान है बल्कि प्रकृति और प्रेम का एक साश्वत अभिलेख है /जीवन की कशमकश किसके साथ नहीं गुजरती लेकिन उसमें
एक इतना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है /
एक इतना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है /
उर्वशी ...से भी अधिक सम्मोहन रखने वाली अपनी ...प्रियतमा के काल -कवलित हो जाने पर' तुषार जी ' की एकाकी ... छटपटाहट ,
जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत
खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/......[समीक्षा]
जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत
खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/......[समीक्षा]
रविवार, 31 जुलाई 2011
गाजियाबाद, विगत रविवार ''काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान में एक रसभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया /जिसमें प्रख्यात कवियों तथा कवित्रियों ने भाग लिया /
डा ० कुंवर बैचैन , देवेन्द्र चौधरी ''तुषार '', डा ० अशोक सक्सेना ,डा ० जय शंकर शुक्ल ,डा ०अंजू सुमन , वंदना कुंवर आदि ने काव्यपाठ कर अपनी रचनाओं से समाँ बांध दिया /गोष्ठी की अध्यक्षता डा ० बैचैन ने की तथा संचालन डा ० शुक्ल ने किया /गीत , कविताओं तथा गजल की यह महफ़िल इतनी शानदार थी कि श्रोता गण झूम उठे /''तुषार '' का गीत---- ''दर्द कितनी याद लेकर,अधखिली -सी भोर लेकर ,
अधखिले से फूल लेकर ,चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर/
''तथा वंदना की कविता ---- बारूद से ,न चाक़ू से, न खंजर से बात कर,
कुंवर बैचैन का छन्द ---सुबह जब घूमने को जाता हूँ ,नीम की पत्तियां चबाता हूँ ,
जितनी कडवाहटें हैं दुनिया में ,मैं उन्हीं को दवा बनाता हूँ/......आदि रचनाओं ने गोष्टी को एक यादगार गोष्टी में बदल दिया /
हिंदी कवितायें न सिर्फ साहित्यिक परिचर्चा का विषय हैं यह सांस्कृतिक परिवेश को भी सुसंस्कृत करतीं हैं /देवेन्द्र चौधरी ''तुषार ''के निवास स्थान पर आयोजित यह गोष्ठी
कुछ साहित्यिक विषयों पर भी चर्चा में रही /साथ ही देश में साहित्य के प्रति बदते रुझान का स्वागत किया गया/
भवदीय -
देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
डा ० कुंवर बैचैन , देवेन्द्र चौधरी ''तुषार '', डा ० अशोक सक्सेना ,डा ० जय शंकर शुक्ल ,डा ०अंजू सुमन , वंदना कुंवर आदि ने काव्यपाठ कर अपनी रचनाओं से समाँ बांध दिया /गोष्ठी की अध्यक्षता डा ० बैचैन ने की तथा संचालन डा ० शुक्ल ने किया /गीत , कविताओं तथा गजल की यह महफ़िल इतनी शानदार थी कि श्रोता गण झूम उठे /''तुषार '' का गीत---- ''दर्द कितनी याद लेकर,अधखिली -सी भोर लेकर ,
अधखिले से फूल लेकर ,चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर/
''तथा वंदना की कविता ---- बारूद से ,न चाक़ू से, न खंजर से बात कर,
कुंवर बैचैन का छन्द ---सुबह जब घूमने को जाता हूँ ,नीम की पत्तियां चबाता हूँ ,
जितनी कडवाहटें हैं दुनिया में ,मैं उन्हीं को दवा बनाता हूँ/......आदि रचनाओं ने गोष्टी को एक यादगार गोष्टी में बदल दिया /
हिंदी कवितायें न सिर्फ साहित्यिक परिचर्चा का विषय हैं यह सांस्कृतिक परिवेश को भी सुसंस्कृत करतीं हैं /देवेन्द्र चौधरी ''तुषार ''के निवास स्थान पर आयोजित यह गोष्ठी
कुछ साहित्यिक विषयों पर भी चर्चा में रही /साथ ही देश में साहित्य के प्रति बदते रुझान का स्वागत किया गया/
भवदीय -
देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
शनिवार, 30 जुलाई 2011
गाजियाबाद, विगत रविवार ;'',काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान में एक रसभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया /जिसमें प्रख्यात कवियों तथा कवित्रियों ने भाग लिया /
डा ० कुंवर बैचैन , देवेन्द्र चौधरी ''तुषार '', डा ० अशोक सक्सेना ,डा ० जय शंकर शुक्ल ,डा ०अंजू सुमन , वंदना कुंवर आदि ने काव्यपाठ कर अपनी रचनाओं से समाँ बांध दिया /गोष्ठी की अध्यक्षता डा ० बैचैन ने की तथा संचालन डा ० शुक्ल ने किया /गीत , कविताओं तथा गजल की यह महफ़िल इतनी शानदार थी कि श्रोता गण झूम उठे /''तुषार '' का गीत---- ''दर्द कितनी याद लेकर,अधखिली -सी भोर लेकर ,
अधखिले से फूल लेकर ,कर ,,चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर/
''तथा वंदना की कविता ---- बारूद से ,न चाक़ू से, न खंजर से बात कर,
कुंवर बैचैन का छन्द ---सुबह जब घूमने को जाता हूँ ,नीम की पत्तियां चबाता हूँ ,
जितनी कडवाहटें हैं दुनिया में ,मैं उन्हीं को दवा बनाता हूँ/......आदि रचनाओं ने गोष्टी को एक यादगार गोष्टी में बदल दिया /
हिंदी कवितायें न सिर्फ साहित्यिक परिचर्चा का विषय हैं यह सांस्कृतिक परिवेश को भी सुसंस्कृत एवम एक आत्मविश्वास से भर देतीं हैं /
डा ० कुंवर बैचैन , देवेन्द्र चौधरी ''तुषार '', डा ० अशोक सक्सेना ,डा ० जय शंकर शुक्ल ,डा ०अंजू सुमन , वंदना कुंवर आदि ने काव्यपाठ कर अपनी रचनाओं से समाँ बांध दिया /गोष्ठी की अध्यक्षता डा ० बैचैन ने की तथा संचालन डा ० शुक्ल ने किया /गीत , कविताओं तथा गजल की यह महफ़िल इतनी शानदार थी कि श्रोता गण झूम उठे /''तुषार '' का गीत---- ''दर्द कितनी याद लेकर,अधखिली -सी भोर लेकर ,
अधखिले से फूल लेकर ,कर ,,चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर/
''तथा वंदना की कविता ---- बारूद से ,न चाक़ू से, न खंजर से बात कर,
कुंवर बैचैन का छन्द ---सुबह जब घूमने को जाता हूँ ,नीम की पत्तियां चबाता हूँ ,
जितनी कडवाहटें हैं दुनिया में ,मैं उन्हीं को दवा बनाता हूँ/......आदि रचनाओं ने गोष्टी को एक यादगार गोष्टी में बदल दिया /
हिंदी कवितायें न सिर्फ साहित्यिक परिचर्चा का विषय हैं यह सांस्कृतिक परिवेश को भी सुसंस्कृत एवम एक आत्मविश्वास से भर देतीं हैं /
गुरुवार, 28 जुलाई 2011
काव्य-शिल्पी
संरक्षक/संयोजक -
देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
अध्यक्ष -
डा ० जय शंकर शुक्ल
गाजियाबाद, विगत रविवार ;'',काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान में एक रसभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया /जिसमें डा ० कुंवर बैचैन ,देवेन्द्र चौधरी ''तुषार '',डा ० अशोक सक्सेना ,डा ० जय शंकर शुक्ल ,द० अंजू सुमन , वंदना कुंवर आदि कवियों ने भाग लिया //गोष्ठी की अध्यक्षता डा ० बैचैन ने की तथा संचालन डा ० शुक्ल ने किया /गीत , कविताओं तथा गजल की यह महफ़िल इतनी शानदार थी कि श्रोता गण झूम उठे /''तुषार '' का गीत ''दर्द कितनी याद लेकर,अधखिली -सी भोर लेकर ''तथा वंदना की रचना ''न चाक़ू से न खंजर से
संरक्षक/संयोजक -
देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
अध्यक्ष -
डा ० जय शंकर शुक्ल
गाजियाबाद, विगत रविवार ;'',काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान में एक रसभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया /जिसमें डा ० कुंवर बैचैन ,देवेन्द्र चौधरी ''तुषार '',डा ० अशोक सक्सेना ,डा ० जय शंकर शुक्ल ,द० अंजू सुमन , वंदना कुंवर आदि कवियों ने भाग लिया //गोष्ठी की अध्यक्षता डा ० बैचैन ने की तथा संचालन डा ० शुक्ल ने किया /गीत , कविताओं तथा गजल की यह महफ़िल इतनी शानदार थी कि श्रोता गण झूम उठे /''तुषार '' का गीत ''दर्द कितनी याद लेकर,अधखिली -सी भोर लेकर ''तथा वंदना की रचना ''न चाक़ू से न खंजर से
सोमवार, 25 जुलाई 2011
शुक्रवार, 8 जुलाई 2011
उक्त दोनों मुक्तक इस कृति के आमुख माने जा सकते हैं /प्रथम में कवि
प्रीत की फुहार को ,धूप -छाँव से सने पलों को,झील की आभा में झाँक कर
अपनी भाव -प्रवंचनाओं को व्यक्त करता है /प्रियतमा के स्वच्छ निर्मल बिम्बों को
प्रकृति के शाश्वत फ्रेम में जड़ देता है /यह कृति का एक रंग है /दुसरे मुक्तक में
कवि महादेवी वर्मा की भाँति ---मैं नीर भरी दुख की बदली अथवा जय शंकर प्रसाद जी के ---आँसू ---
की तरह अपनी पीड़ा को एक गरल की तरह हँसते - हँसते पी जाना चाहता है /i
March 29 at 8:16pm ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
संग्रह की रचनाओं को इस करीने से सजाया व संवारा गया है ,कि एक लय -प्रवाह
अंत तक कहीं टूटता नहीं है ,कहीं बिखरता नहीं है अपितु कवि दिल -दिमाग पर छा
जाता है/उदाहरण के लिए ----
निमिष -निमिष नयनों में क्या है ,एक झील सी प्रीत तुम्हारी,
अंग -अंग पर खेल रही है ,धूप तुम्हारी छाँव हमारी ,
एवम
छुपे -छुपे ही रह जाते हैं ,अक्सर आँखों में कुछ आँसू ,
जीने वाले जी लेते हैं ,पी -पी कर ही अपने आँसू ,
March 29 at 7:43pm ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
कवि तुषार का दूसरा काव्य संग्रह ---गीतों के बादल ---अयन प्रकाशन ,नयी दिल्ली ,द्वारा प्रकाशित हुआ है /
सन १९६७ में, प्रथम काव्य संग्रह ----भीगे पथ पर ----के प्रकाशन के उपरांत यह दूसरा काव्य संग्रह पूरे ४३ वर्ष के बाद ,
पुस्तकाकार रूप में हमारे सम्मुख आ पाया है,/
March 29 at 4:19am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
प्रीत की फुहार को ,धूप -छाँव से सने पलों को,झील की आभा में झाँक कर
अपनी भाव -प्रवंचनाओं को व्यक्त करता है /प्रियतमा के स्वच्छ निर्मल बिम्बों को
प्रकृति के शाश्वत फ्रेम में जड़ देता है /यह कृति का एक रंग है /दुसरे मुक्तक में
कवि महादेवी वर्मा की भाँति ---मैं नीर भरी दुख की बदली अथवा जय शंकर प्रसाद जी के ---आँसू ---
की तरह अपनी पीड़ा को एक गरल की तरह हँसते - हँसते पी जाना चाहता है /i
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Tushar Devendrachaudhry
संग्रह की रचनाओं को इस करीने से सजाया व संवारा गया है ,कि एक लय -प्रवाह
अंत तक कहीं टूटता नहीं है ,कहीं बिखरता नहीं है अपितु कवि दिल -दिमाग पर छा
जाता है/उदाहरण के लिए ----
निमिष -निमिष नयनों में क्या है ,एक झील सी प्रीत तुम्हारी,
अंग -अंग पर खेल रही है ,धूप तुम्हारी छाँव हमारी ,
एवम
छुपे -छुपे ही रह जाते हैं ,अक्सर आँखों में कुछ आँसू ,
जीने वाले जी लेते हैं ,पी -पी कर ही अपने आँसू ,
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Tushar Devendrachaudhry
कवि तुषार का दूसरा काव्य संग्रह ---गीतों के बादल ---अयन प्रकाशन ,नयी दिल्ली ,द्वारा प्रकाशित हुआ है /
सन १९६७ में, प्रथम काव्य संग्रह ----भीगे पथ पर ----के प्रकाशन के उपरांत यह दूसरा काव्य संग्रह पूरे ४३ वर्ष के बाद ,
पुस्तकाकार रूप में हमारे सम्मुख आ पाया है,/
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Tushar Devendrachaudhry
श्रंगार को रसराज कहा गया है, डा ० हरिवंश राय बच्चन के अनुसार कवि रूमानी- भावनाओं को
सहजता से अभिव्यक्त करने में सफल है ,इसमें कोई शक नहीं /गीतों के बादल---- में कवि के कुछ गीत
श्रंगार की इस रसमयता को तन्मयता से भर देने में सक्षम हैं------
जितनी रस की धारायें थीं ,उन्मीलित-सी परिप्लावित थीं,
दिशा -दिशा में आवाहन था , मंद हवायें आह्लादित थीं ,
एवम
तुम नहाकर चाँदनी में , केश अपने मत सुखाओ ,
रात ठिठकी सी हुई है , चाँद ठिठका -सा खड़ा है ,
March 30 at 3:59am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
कवि अपने जीवन की रिक्तता का भी आभास बड़ी सहजता से कराता है ,वो प्रकृति और
प्रियतमा में ऐसा साम्य स्थापित कर देता है कि उसकी अभिव्यक्ति बिम्बों को एकाकार
कर देती है /ऐसा अद्भुत समायोजन ....नदी के दो किनारों की तरह ,प्रीत के दो किनारे नहीं हो सकते ,यह
---तुषार-- जैसे कवि की सामर्थ्य का प्रमाण है /कवि अमूर्त प्रेम को मूर्त प्रेम में ,,,मूर्त प्रेम को अमूर्त प्रेम में ,
रेखांकित करता है या मन को ,कहाँ तक छूता हुआ निकल जाता है पता नहीं चलता /
March 30 at 2:36am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
प्रीत के दो - दो किनारे ,हो नहीं सकते यहाँ पर ,
एक तुम छूलो बहाँ पर, एक में छूलूं यहाँ पर ,
उक्त तीनों अन्तराएँ प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करने के लिए
एक अभिनव उद्यम हैं /कवि द्वारा प्रथम अंतरे में प्रकृति के सुन्दर प्रतीकों का प्रयोग ,प्यार
की खुशबु बिखेरने का ,बसंत के आगमन पर नव कोंपलों का आकार लेती प्रियतमा का ,मन प्राणों में
घुल जाने का द्रश्य देखते ही बनता है/
श्रंगार को रसराज कहा गया है, डा ० हरिवंश राय बच्चन के अनुसार कवि रूमानी- भावनाओं को
सहजता से अभिव्यक्त करने में सफल है ,इसमें कोई शक नहीं /गीतों के बादल---- में कवि के कुछ गीत
श्रंगार की इस रसमयता को तन्मयता से भर देने में सक्षम हैं------
जितनी रस की धारायें थीं ,उन्मीलित-सी परिप्लावित थीं,
दिशा -दिशा में आवाहन था , मंद हवायें आह्लादित थीं ,
एवम
तुम नहाकर चाँदनी में , केश अपने मत सुखाओ ,
रात ठिठकी सी हुई है , चाँद ठिठका -सा खड़ा है ,
March 30 at 3:59am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
कवि अपने जीवन की रिक्तता का भी आभास बड़ी सहजता से कराता है ,वो प्रकृति और
प्रियतमा में ऐसा साम्य स्थापित कर देता है कि उसकी अभिव्यक्ति बिम्बों को एकाकार
कर देती है /ऐसा अद्भुत समायोजन ....नदी के दो किनारों की तरह ,प्रीत के दो किनारे नहीं हो सकते ,यह
---तुषार-- जैसे कवि की सामर्थ्य का प्रमाण है /कवि अमूर्त प्रेम को मूर्त प्रेम में ,,,मूर्त प्रेम को अमूर्त प्रेम में ,
रेखांकित करता है या मन को ,कहाँ तक छूता हुआ निकल जाता है पता नहीं चलता /
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Tushar Devendrachaudhry
प्रीत के दो - दो किनारे ,हो नहीं सकते यहाँ पर ,
एक तुम छूलो बहाँ पर, एक में छूलूं यहाँ पर ,
उक्त तीनों अन्तराएँ प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करने के लिए
एक अभिनव उद्यम हैं /कवि द्वारा प्रथम अंतरे में प्रकृति के सुन्दर प्रतीकों का प्रयोग ,प्यार
की खुशबु बिखेरने का ,बसंत के आगमन पर नव कोंपलों का आकार लेती प्रियतमा का ,मन प्राणों में
घुल जाने का द्रश्य देखते ही बनता है/
Tushar Devendrachaudhry
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सच प्रतीत होता है /इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है ,
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा ,
March 30 at 7:08am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
Tushar Devendrachaudhry
और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी ,
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /
प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से
...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा हैSee More
March 30 at 6:50am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,
चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
March 30 at 5:05am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/
कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /
दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व
अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है
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सच प्रतीत होता है /इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है ,
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा ,
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और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी ,
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /
प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से
...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा हैSee More
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नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,
चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
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उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/
कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /
दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व
अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है
यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही
मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के
प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन ,
March 31 at 12:45am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है ,
March 30 at 9:53pm ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /
शिल्प ,सज्जा का ध्यान रखता है / कथन , एक मंच की तरह है /अलंकार व समास आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /
और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है /
March 30 at 8:35pm ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
को जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को
अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है /
तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा ,लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है /
मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के
प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन ,
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कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है ,
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तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /
शिल्प ,सज्जा का ध्यान रखता है / कथन , एक मंच की तरह है /अलंकार व समास आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /
और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है /
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को जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को
अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है /
तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा ,लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है /
कवि जब निराशा के गहन -अंधकार में घिरता है ,उसकी स्याह चादर में अपने साथ
सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा ,
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी
नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी /
March 31 at 2:28am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
इस जगह पर कवि ने बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /
तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक
या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /कवि का अंदाजे बयाँ
एक साथ कितने जादू कर देता है ,देखते ही बनता है/
March 31 at 1:03am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही
मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के
प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन ,
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सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा ,
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी
नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी /
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इस जगह पर कवि ने बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /
तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक
या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /कवि का अंदाजे बयाँ
एक साथ कितने जादू कर देता है ,देखते ही बनता है/
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यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही
मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के
प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन ,
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Tushar Devendrachaudhry
कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,
उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,
बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली
March 31 at 5:27am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /
वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /
आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित
नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /
यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...
March 31 at 5:03am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो ,
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
March 31 at 2:52am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी
अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है /
वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के
बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,
उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,
बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली
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संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /
वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /
आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित
नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /
यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...
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Tushar Devendrachaudhry
देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो ,
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
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Tushar Devendrachaudhry
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी
अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है /
वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के
बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
शनिवार, 18 जून 2011
मंगलवार, 24 मई 2011
R.k. Gupta तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आगई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
May 15 at 10:37pm · Arun Sagar--tushar ji -kee pustak 'geeton ke badal' ek prati mujhe bhee praapt huyee hai.padhane ke baad yah pataa chalaa kee geeton ke madhyam se zindagee ke dard ko panqtiyon me kaise ubhaaraa jaataa hai.ek-ek chha...nd padhakar aankhon me ---aansoo chhalak gaye.--geet kee samast vidhaon ka is pustak men ek saath darshan ho jaataa hai.main umeed karta hoon kee yah pustak saahitya ke kshetra me apanaa mahatwapoorn sth
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May 15 at 10:39pm · Pawan Kumar-- Geeton ke Badal --mein Sabse Khoobsurat Geet...!! "Amaltash"...!! Kyaa Kyaa Roop dharhe hain..!! waah sir ji Waah..!! Speachless...!!
May 15 at 10:40pm · Neelam Anshu बादलों में, सागरों में ,सिर्फ तेरा ही उमड़ना , देखने की जिद हमें थी , डूबकर तुझमें उतरना ।
May 15 at 10:37pm · Arun Sagar--tushar ji -kee pustak 'geeton ke badal' ek prati mujhe bhee praapt huyee hai.padhane ke baad yah pataa chalaa kee geeton ke madhyam se zindagee ke dard ko panqtiyon me kaise ubhaaraa jaataa hai.ek-ek chha...nd padhakar aankhon me ---aansoo chhalak gaye.--geet kee samast vidhaon ka is pustak men ek saath darshan ho jaataa hai.main umeed karta hoon kee yah pustak saahitya ke kshetra me apanaa mahatwapoorn sth
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May 15 at 10:39pm · Pawan Kumar-- Geeton ke Badal --mein Sabse Khoobsurat Geet...!! "Amaltash"...!! Kyaa Kyaa Roop dharhe hain..!! waah sir ji Waah..!! Speachless...!!
May 15 at 10:40pm · Neelam Anshu बादलों में, सागरों में ,सिर्फ तेरा ही उमड़ना , देखने की जिद हमें थी , डूबकर तुझमें उतरना ।
गीतों में निजता के बिम्ब गीत गुनगुनाने की जरूरत हमारे रोजमर्रा के जीवन को आनंद की अनुभूति से भर देती है /संगीत और शब्दों की मिठास के प्रति चाहत एक प्राकृतिक क्रिया है /'गीतों के बादल ' के गीत रूमानियत और निजी अंतरद्वंदों के मिले जुले भाव प्रस्तुत करते हैं /इन गीतों का रचनाकाल [१९७०-२००९]स्वयं गीतकार की रचना प्रक्रिया के बनने- सँवरने का प्रमाण देता है /शुरू से अंत तक इन गीतों के भाव एक -एक पग बदते हुए चलते हैं /कहना
geeton ke baadal
Smeeksha, Hindustan Times, New Delhi, 15th May 2011
प्रकाशित समीक्षा [गीतों के बादल] ' तुषार ' हिंदुस्तान दैनिक समाचार १५ मई ,नयी दिल्ली /
By: Tushar Devendrachaudhry
geeton ke baadal
Smeeksha, Hindustan Times, New Delhi, 15th May 2011
प्रकाशित समीक्षा [गीतों के बादल] ' तुषार ' हिंदुस्तान दैनिक समाचार १५ मई ,नयी दिल्ली /
By: Tushar Devendrachaudhry
सोमवार, 23 मई 2011
तुषार जी ,.....सादर ..नमस्ते ,आपकी कवितायें जीवन के ऊँचे -नीचे रास्तों पर शब्दों की ऊँगली थामे एक के बाद एक डग भरतीं हैं /शैशवावस्था से तरुणाई की ओर,और उसे और आगे बदातीं हैं ..लगता ही नहीं कि हम किसी कविता को पद रहे हैं /आपकी कवितायें, जीवन के हर पहलू को जीवंत करतीं हैं /हम यह तो कह नहीं सकते कि यह कविता ज्यादा अच्छी है या यह वाली ....हम चाहकर भी ... चार कवितायें छोड़ कर पद नहीं सकते ...सब एक के बाद एक क्र
Navin C. Chaturvedi
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देत...ी है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
आप कृपया मुझे अपनी बॅंक अकाउंट डीटेल दीजिए, मुझे इस पुस्तक की न्यौछावर जमा करनी है| यहाँ सवाल पैसों का नहीं, बल्कि एक सरस्वती पुत्र के सम्मान का है| यदि हम लोग ही एक दूसरे का सम्मान नहीं करेंगे तो पॉप संस्कृति के चौबारे पर ठुमके लगाती नस्ल से उम्मीद करना बेमानी होगा.............
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देत...ी है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
आप कृपया मुझे अपनी बॅंक अकाउंट डीटेल दीजिए, मुझे इस पुस्तक की न्यौछावर जमा करनी है| यहाँ सवाल पैसों का नहीं, बल्कि एक सरस्वती पुत्र के सम्मान का है| यदि हम लोग ही एक दूसरे का सम्मान नहीं करेंगे तो पॉप संस्कृति के चौबारे पर ठुमके लगाती नस्ल से उम्मीद करना बेमानी होगा.............
तुषार जी !'गीतों के बादल' ने 'गीतों की बरसात' में भिगो दिया.जीवन में सुख दुःख सबके हिस्से आते और भोगे जाते हें.संवेदनशील मन में ऎसी एक-एक घटना अणु-विस्फोट सी फूटती है और कभी कभी कविता या लेखन में फूट बहती है.आपका प्रकरण अनूठा है -युवा-काल की दहलीज़ पर अनुज को खोने का दारुण दुख, फिर,उस वय के सहज प्राकृतिक आकर्षणों के मरहम, तदन्तर अत्यंत रागमय सहचरी के चन्दन जैसे अनुराग की गहराई और सौंदर्य में डूबते ही जाना,अकस्मात् , परम प्रिय पुत्री का अकाल ही चले जाना,एक पुत्री के विवाह से जुड़ी विषम अत्यंत त्रासक समस्याओं का सिलसिला,और, अंतत: सहचरी का दैहिक अवसान.यह सब आप के संवेदनशील अंतर में अनवरत अणु-विष्फोट की तरह फूट-फूट कर पीड़ा और प्रेम, संयोग और वियोग, लयपूर्ण अभिव्यक्ति और सटीक सार्थक शब्दों में भाव भरे घने मेघों की तरह घुमड़-घुमड़ कर झड़ी लगा कर बरसते ही चले गए हैं, बरसते ही जा रहे हैं. निश्चय ही जिस प्रकृति ने आपको इतना संवेदनशील बनाया है उसी ने आपको 'बिखरने' से बचाने की सहन शक्ति देने के लिए यह काव्य धारा भी प्रदान की है -"फूल उठा है अमलतास पर पीले फूलों के सहे ले.ऐसे ही क्या धीरे धीरे से,टूटा संबल, जुड़ जाता हैरह सकता जो योगी-सम, वहराज पुरुष भी बन सकता है."उपर्युक्त पंक्तियाँ लिखने के बाद भी आपके अन्दर-बाहर से बहुत कुछ रीत गया है , लेकिन निश्चय ही अब भी आपके अन्दर फूट रहे कविता के सोते कंठ-आपूरित पीड़ा को थोड़ा सा निसृत करेंगे. आपकी कविताएँ बहुत से पाठकों को भाएँगी, आनंद देंगी, सहारा देंगी. उनके हिस्से इतना ही आएगा. बार बार जिस पीड़ा को भोग कर आप अपनी कविता की एक एक पंक्ति का सृजन कर रहे हैं उसे भोगना 'आप की ही' नियति है, पाठक तो उसे अंशमात्र ही छू सकेंगे.विनम्र आदर और ढेर सी शुभ काम्नाओं सहित,--राकेश तिवारी
Tushar Devendrachaudhry Manorma Mishra tushaar ji.... sadar namaste.... apki kavitayen jeevan ke unche neeche raston per sabdon ki ungali thame, ek ke bad ek dag bharti hui, shaishvastha se tarudai ki or our usase hi age ki or badhati hain.lagta hi nahi ham kisi k...avita ko pad...ha rahe hain.. aapkii kavitaon jeevan ke har pahloo ko jeevant karti hain.. ham ye to kah hi nahi sakte ki ye kavita jada achchhi hai ya ye vali.ham cha kar bhi char kavitayen chhod kar nahi padh sakte... sab ek ke bad ek karamansaar vayavasthit hain...usi ka apna ananad hai.. bahut achchha likhate hain aap... shesh fir.......
“गीतों के बादल″ संघर्षो भरे प्रेम की गाथा"
श्रवण शुक्ल, लेखक पत्रकार हैं
श्रवण शुक्ल
हाल ही में एक प्रेममहाकाव्य पढ़ने के दौरान जिंदगी के गूढ़ रहस्यों के अनुभव को समझने की कोशिस किया, प्रेममहाकाव्य का नाम है …’गीतों के बादल′ (जोकि तुषार देवचौधरी द्वारा लिखित एवं संकलित है.) …प्रेमकाव्यग्रन्थ इसलिए क्योकि इस काव्यसंग्रह में जीवन भर के अनुभव और प्यार की तरुणाई से लबरेज शब्दों की मालाएं पिरोई गई है .. कहने के लिए यह कविता संग्रह है जोकि जीवन के अनुभवों पर केंद्रित . कवि की जिंदगी में होने वाले उथल-पुथल और संघर्ष को दर्शाती है . लेकिन मेरी नज़र में यह पूरी जिंदगी की गाथा होने के साथ प्यार के प्रतीक के रूप में अपने प्राणप्रिये को समर्पित सन्देश है . जिसको पढकर लोग अपने जीवन के अनुभव को महसूस करेंगे और एक-एक लाइन में होने वाले संघर्ष को जीना चाहेंगे ..कुछ लाइने पूरी जिंदगी को झकझोर देंगी ..जैसे.. बादलों में, सागरों में ,
सिर्फ तेरा ही उमड़ना ,देखने की जिद हमें थी ,डूबकर तुझमें उतरना
पूरे काव्य संग्रह में लिखी हर कविता में वो सब है जो साधारण कवि की कल्पना से अक्सर बाहर ही होता है .. जिंदगी भर के संघर्ष, प्यार,नफरत, और सहन शीलता की झलक है इसमें..
आप किताब की भूमिका पढेंगे तो आपको एकबारगी लगेगा कि यह किताब मात्र एकतरफा ही होगी जो कवि के जीवन को ही गौरवान्वित करने का प्रयत्न करेगी.. लेकिन आपको काव्य रचनाये पढते समय भूमिका को भूलना पड़ेगा.. क्योकि भूमिका में कवि ने अपने जीवन की उन घटनाओं का उल्लेख किया है जिसने हर हल , हर समय कवि के जीवन को झकझोर दिया है … यह किताब पढते वक्त आपको कवि के पूरे जीवन के अनुभव कि झलक मिलेगी …
खास बात यह है कि इस किताब को लिखने एवं सारी घटनाओं को कलमबद्ध करते – 2 , अपने नए सुख-दुःख- प्यार-नफरत को पिरोते हुए ३ दशक लंबा वक्त लगा है…
यह किताब इतनी बेहतरीन इसलिए बन पाई है क्योकि इसकी रचना करते समय बहुत ही धैर्य रखा गया है.. ३ दशकों के धैर्य को पिरोती हुई यह किताब आधुनिक रचनाओं की मौलिकता में श्रेष्ठ लगती है .. आज के कवियो की किताबें सिर्फ २-४ महीनों में ही लिखी जाती है इसीलिए वह प्रासंगिकता उनमे नहीं रह पाती जो इस किताब में है..कवितायें जीवन के ऊँचे -नीचे रास्तों पर शब्दों की ऊँगली थामे एक के बाद एक डग भरतीं नज़र आती है, पहले भाग ‘भीगे पथ पर’ की घटनाओं को ३ दशकों बाद आगे बढाती है…लगता ही नहीं कि हम किसी किताब की अगली कड़ी पढ़ रहे है .. ‘गीतों के बादल′ जीवन के हर पहलू को जीवंत करतीं हैं..
कैसे कैसे स्वरुप है प्यार के, प्यार भरे संघर्ष के.. जो जीवन के चरित्र को रोमांचित कर देती है .अभी तक मेरे द्वारा पढ़ी गई प्रेमकाव्यग्रंथों में से सर्वश्रेष्ठ)
मेरी नज़र में यह निर्विवाद रूप से बेहद उम्दा काव्यग्रंथ है.. हम यह नहीं कह सकते कि कौन सी कविता ज्यादा अच्छी है.. और पढ़ना शुरू करने के बाद चाहकर भी हम इससे दूर नहीं भाग सकते . क्योकि इन कविताओ में जीवन का रोमांच छिपा हुआ है. ,
मैंने इसे अपने ब्लॉग पर इसलिए भी लिखा है क्योकि मेरी नजर में जीवन के सुख-दुःख प्यार नफरत को कविताओं में माध्यम से जीवंत करने का इससे बेहतर नजरिया हो ही नहीं सकता.. आखिर इसीलिए तो माना जाता है कि “जीवन एक संघर्ष” है जिससे जीत हासिल करना और जीत हासिल करके भी न जीतना … सबकुछ सीखना पड़ता है ..
श्रवण शुक्ल, लेखक पत्रकार हैं
श्रवण शुक्ल
हाल ही में एक प्रेममहाकाव्य पढ़ने के दौरान जिंदगी के गूढ़ रहस्यों के अनुभव को समझने की कोशिस किया, प्रेममहाकाव्य का नाम है …’गीतों के बादल′ (जोकि तुषार देवचौधरी द्वारा लिखित एवं संकलित है.) …प्रेमकाव्यग्रन्थ इसलिए क्योकि इस काव्यसंग्रह में जीवन भर के अनुभव और प्यार की तरुणाई से लबरेज शब्दों की मालाएं पिरोई गई है .. कहने के लिए यह कविता संग्रह है जोकि जीवन के अनुभवों पर केंद्रित . कवि की जिंदगी में होने वाले उथल-पुथल और संघर्ष को दर्शाती है . लेकिन मेरी नज़र में यह पूरी जिंदगी की गाथा होने के साथ प्यार के प्रतीक के रूप में अपने प्राणप्रिये को समर्पित सन्देश है . जिसको पढकर लोग अपने जीवन के अनुभव को महसूस करेंगे और एक-एक लाइन में होने वाले संघर्ष को जीना चाहेंगे ..कुछ लाइने पूरी जिंदगी को झकझोर देंगी ..जैसे.. बादलों में, सागरों में ,
सिर्फ तेरा ही उमड़ना ,देखने की जिद हमें थी ,डूबकर तुझमें उतरना
पूरे काव्य संग्रह में लिखी हर कविता में वो सब है जो साधारण कवि की कल्पना से अक्सर बाहर ही होता है .. जिंदगी भर के संघर्ष, प्यार,नफरत, और सहन शीलता की झलक है इसमें..
आप किताब की भूमिका पढेंगे तो आपको एकबारगी लगेगा कि यह किताब मात्र एकतरफा ही होगी जो कवि के जीवन को ही गौरवान्वित करने का प्रयत्न करेगी.. लेकिन आपको काव्य रचनाये पढते समय भूमिका को भूलना पड़ेगा.. क्योकि भूमिका में कवि ने अपने जीवन की उन घटनाओं का उल्लेख किया है जिसने हर हल , हर समय कवि के जीवन को झकझोर दिया है … यह किताब पढते वक्त आपको कवि के पूरे जीवन के अनुभव कि झलक मिलेगी …
खास बात यह है कि इस किताब को लिखने एवं सारी घटनाओं को कलमबद्ध करते – 2 , अपने नए सुख-दुःख- प्यार-नफरत को पिरोते हुए ३ दशक लंबा वक्त लगा है…
यह किताब इतनी बेहतरीन इसलिए बन पाई है क्योकि इसकी रचना करते समय बहुत ही धैर्य रखा गया है.. ३ दशकों के धैर्य को पिरोती हुई यह किताब आधुनिक रचनाओं की मौलिकता में श्रेष्ठ लगती है .. आज के कवियो की किताबें सिर्फ २-४ महीनों में ही लिखी जाती है इसीलिए वह प्रासंगिकता उनमे नहीं रह पाती जो इस किताब में है..कवितायें जीवन के ऊँचे -नीचे रास्तों पर शब्दों की ऊँगली थामे एक के बाद एक डग भरतीं नज़र आती है, पहले भाग ‘भीगे पथ पर’ की घटनाओं को ३ दशकों बाद आगे बढाती है…लगता ही नहीं कि हम किसी किताब की अगली कड़ी पढ़ रहे है .. ‘गीतों के बादल′ जीवन के हर पहलू को जीवंत करतीं हैं..
कैसे कैसे स्वरुप है प्यार के, प्यार भरे संघर्ष के.. जो जीवन के चरित्र को रोमांचित कर देती है .अभी तक मेरे द्वारा पढ़ी गई प्रेमकाव्यग्रंथों में से सर्वश्रेष्ठ)
मेरी नज़र में यह निर्विवाद रूप से बेहद उम्दा काव्यग्रंथ है.. हम यह नहीं कह सकते कि कौन सी कविता ज्यादा अच्छी है.. और पढ़ना शुरू करने के बाद चाहकर भी हम इससे दूर नहीं भाग सकते . क्योकि इन कविताओ में जीवन का रोमांच छिपा हुआ है. ,
मैंने इसे अपने ब्लॉग पर इसलिए भी लिखा है क्योकि मेरी नजर में जीवन के सुख-दुःख प्यार नफरत को कविताओं में माध्यम से जीवंत करने का इससे बेहतर नजरिया हो ही नहीं सकता.. आखिर इसीलिए तो माना जाता है कि “जीवन एक संघर्ष” है जिससे जीत हासिल करना और जीत हासिल करके भी न जीतना … सबकुछ सीखना पड़ता है ..
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