गीतों में निजता के बिम्ब गीत गुनगुनाने की जरूरत हमारे रोजमर्रा के जीवन को आनंद की अनुभूति से भर देती है /संगीत और शब्दों की मिठास के प्रति चाहत एक प्राकृतिक क्रिया है /'गीतों के बादल ' के गीत रूमानियत और निजी अंतरद्वंदों के मिले जुले भाव प्रस्तुत करते हैं /इन गीतों का रचनाकाल [१९७०-२००९]स्वयं गीतकार की रचना प्रक्रिया के बनने- सँवरने का प्रमाण देता है /शुरू से अंत तक इन गीतों के भाव एक -एक पग बदते हुए चलते हैं /कहना
geeton ke baadal
Smeeksha, Hindustan Times, New Delhi, 15th May 2011
प्रकाशित समीक्षा [गीतों के बादल] ' तुषार ' हिंदुस्तान दैनिक समाचार १५ मई ,नयी दिल्ली /
By: Tushar Devendrachaudhry
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