मेरे सपनों का ये भारत कुछ तो अन्ना में दीखा है,
इतिहास बदलता दीखा है इन्सान उभरता दीखा है ,
आन्दोलन की उपलब्धि कम नहीं थी ,नौकरशाही , लोकशाही ,न्याय व्यवस्था का लचीलापन ,आम आदमी के प्रति बेरुखी और भ्रष्टाचार का बोलबाला ,
सबके ऊपर करारा प्रहार था /सरकार की नींद खुली /जनता का शांतिपूर्ण प्रदर्शन अभूतपूर्व था /
..............''.तुषार'' देवेन्द्र चौधरी ,वैशाली ,गाजियाबाद
रविवार, 28 अगस्त 2011
मंगलवार, 16 अगस्त 2011
यह आन्दोलन देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ध्वस्त न कर दे /सरकार पर बाहर से दबाव -- भविष्य में किसी भी निर्वाचित सरकार को काम नहीं करने देगा /
सरकार को जिस तरह ---ब्लेक मेल किया जा रहा है , --देश बिखर जाएगा /सरकार लोकपाल पर बिचार कर रही है / अन्ना, अनशन से धमका कर लोकपाल बनाना चाहते हैं /
सरकार को नीचा दिखाना चाहते हैं / उसे अंग्रेजों की सरकार ,खुद को गाँधी साबित करने का तमाशा बना रहे हैं / बच्चे गुमराह हो जाते हैं /--- वन्दे मातरम /
सरकार को जिस तरह ---ब्लेक मेल किया जा रहा है , --देश बिखर जाएगा /सरकार लोकपाल पर बिचार कर रही है / अन्ना, अनशन से धमका कर लोकपाल बनाना चाहते हैं /
सरकार को नीचा दिखाना चाहते हैं / उसे अंग्रेजों की सरकार ,खुद को गाँधी साबित करने का तमाशा बना रहे हैं / बच्चे गुमराह हो जाते हैं /--- वन्दे मातरम /
शनिवार, 13 अगस्त 2011
''तुषार जी का या संग्रह इतना सहज, सरल, सुगम है कि इसमें ---सरसता-- जिसे हम एक 'श्रेष्ठ काव्य' की झांकी कह सकते हैं इस संग्रह के शब्द -शब्द में घुली हुई है /भाषा पर अलंकारो का अतिशय बोझ नहीं है /कहीं -कहीं ' 'मितवा ' ' मनवा ' आदि शब्दों का प्रयोग भाषा में आकर्षण का केंद्र बन जाता है/बाल्मीकि से लेकर कालिदास तक ,पन्त से लेकर निराला तक बहुत कुछ है ,मगर ''तुषार जी' की बात ही और है /उनके गीत या जीवन संगीत में भेद करना मेरे बस में नहीं /....[.समीक्षा ]
हमारी ,तुम्हारी आत्मा एक है /हम दोनों में कौई फर्क नहीं है /फिर हमारे अलग होने का कोई मतलब ही नहीं है/मैं स्वर्ग में आकर तुम्हें
प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें
सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
..[.समीक्षा ]
प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें
सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
..[.समीक्षा ]
उन्हें तिनका -तिनका रोता प्रतीत होता है ,सुबह लुटी हुई ,शाम झुलसी हुई प्रतीत होती है /ख़ुशी का कहीं एक कतरा भी नहीं दिखाई देता /मगर हिम्मत है ,दिलासा है , अपने प्यार पर यकीन है /वो कहते हैं ---- --------------------------------------------बाकी हैं कुछ मेरी साँसें ,आऊँगा तेरे पास कभी,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी ,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी ,
कवि ने सिर्फ अविधा में भाव पिरोने का साहस किया है ,लक्षणा ,व्यंजना से परहेज /वो चाहता तो काव्य के शेष दो कारकों का इस्तेमाल कर सकता था मगर उसके भाव --
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी
कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई''.....[.समीक्षा ]
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी
कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई''.....[.समीक्षा ]
गुरुवार, 11 अगस्त 2011
शोक- संतप्त कवि अपनी प्राण बल्लभा की स्मृति में यह संग्रह समर्पित करते हुए जब आकाश में बादलों की घटायें देखता है ,धरती पर समुन्दर के पानी को देखता है ,
उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है,''....[.समीक्षा ]
उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है,''....[.समीक्षा ]
बुधवार, 10 अगस्त 2011
यह सम्पूर्ण संग्रह ...श्रंगार और करुण रस का एक मधु कलश है/कहीं सौन्दर्य की प्यास तो कहीं विरह की आग /कहीं मिलन की मधु - यामिनी तो कहीं वियोग का अंधकार /
उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत
जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
..............[समीक्षा ]
उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत
जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
..............[समीक्षा ]
यह संग्रह ३९ वर्षों के वैवाहिक जीवन की न सिर्फ दास्तान है बल्कि प्रकृति और प्रेम का एक साश्वत अभिलेख है /जीवन की कशमकश किसके साथ नहीं गुजरती लेकिन उसमें
एक इतना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है /
एक इतना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है /
उर्वशी ...से भी अधिक सम्मोहन रखने वाली अपनी ...प्रियतमा के काल -कवलित हो जाने पर' तुषार जी ' की एकाकी ... छटपटाहट ,
जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत
खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/......[समीक्षा]
जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत
खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/......[समीक्षा]
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