बुधवार, 10 अगस्त 2011

उर्वशी ...से भी अधिक सम्मोहन रखने वाली अपनी ...प्रियतमा के काल -कवलित हो जाने पर' तुषार जी ' की एकाकी ... छटपटाहट ,
जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत
खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/......[समीक्षा]

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