''तुषार जी का या संग्रह इतना सहज, सरल, सुगम है कि इसमें ---सरसता-- जिसे हम एक 'श्रेष्ठ काव्य' की झांकी कह सकते हैं इस संग्रह के शब्द -शब्द में घुली हुई है /भाषा पर अलंकारो का अतिशय बोझ नहीं है /कहीं -कहीं ' 'मितवा ' ' मनवा ' आदि शब्दों का प्रयोग भाषा में आकर्षण का केंद्र बन जाता है/बाल्मीकि से लेकर कालिदास तक ,पन्त से लेकर निराला तक बहुत कुछ है ,मगर ''तुषार जी' की बात ही और है /उनके गीत या जीवन संगीत में भेद करना मेरे बस में नहीं /....[.समीक्षा ]
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