बुधवार, 30 नवंबर 2011

वस्तुत: ''तुषार जी '' भावों के चितेरे हैं /भावात्मक आरोह- अवरोह की अद्भुत सामर्थ्य है उनमें / वो उसे शब्दों में गूंथ कर जीवंत कर देते हैं /''गीतों के बादल' ' काव्य संग्रह मुझे एक मित्र द्वारा ,अकस्मात ही प्राप्त हुआ /इससे पहले मैं ''तुषार जी '' को नहीं जानता था / मगर जब उनके गीत पदे ,अवाक् रह गया /मैंने समीक्षा भी लिख दी / आप अंदाज लगा सकते हैं मैं कितना प्रभावित हो गया था /सच तो यह है ''तुषार जी' ' मन में उतर कर रह ही जाते हैं / उनका अपने गीतों के बारे में यह कथन ----
''अगर किसी का मन ये छू लें , इनकी कीमत मिल जायेगी ''
'' तुषार जी'' को शायद न पता हो मगर उनके गीत अमूल्य हैं /

''तुषार जी का या संग्रह इतना सहज, सरल, सुगम है कि इसमें ---सरसता-- जिसे हम एक 'श्रेष्ठ काव्य' की झांकी कह सकते हैं इस संग्रह के शब्द -शब्द में घुली हुई है /भाषा पर अलंकारो का अतिशय बोझ नहीं है /कहीं -कहीं ' 'मितवा ' ' मनवा ' आदि शब्दों का प्रयोग भाषा में आकर्षण का केंद्र बन जाता है/बाल्मीकि से लेकर कालिदास तक ,पन्त से लेकर निराला तक बहुत कुछ है ,मगर ''तुषार जी' की बात ही और है /उनके गीत या जीवन संगीत में भेद करना मेरे बस में नहीं /
हमारी ,तुम्हारी आत्मा एक है /हम दोनों में कौई फर्क नहीं है /फिर हमारे अलग होने का कोई मतलब ही नहीं है/मैं स्वर्ग में आकर तुम्हें प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
उन्हें तिनका -तिनका रोता प्रतीत होता है ,सुबह लुटी हुई ,शाम झुलसी हुई प्रतीत होती है /ख़ुशी का कहीं एक कतरा भी नहीं दिखाई देता /मगर हिम्मत है ,दिलासा है , अपने प्यार पर यकीन है /वो कहते हैं ----
बाकी हैं कुछ मेरी साँसें ,आऊँगा तेरे पास कभी,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी //

कवि इतने आँसू बहाकर भी हारा नहीं है /हताश नहीं है ,टूट चूका है मगर उदास नहीं है/ ' भवभूति ' के राम की करुणा , चाहे घनीभूत है वहाँ हताशा- निराशा है /राम सर्व शक्तिमान हैं /वे नियति और विधान तक बदलने की ताकत रखते हैं मगर सीता के वियोग में सोचते हैं -यह ह्रदय फट क्यों नहीं जाता ,इसके दो टुकड़े क्यों नहीं हो जाते /वो निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं /मगर 'तुषार' विक्षिप्त होते हुए भी तूफानों से लड़ते हैं /चिर -पतझड़ दोने के लिए तैयार हैं / कवि ने सिर्फ अविधा में भाव पिरोने का साहस किया है ,लक्षणा ,व्यंजना से परहेज /वो चाहता तो काव्य के शेष दो कारकों का इस्तेमाल कर सकता था मगर उसके भाव --
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----
''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई//
शोक- संतप्त कवि अपनी प्राण बल्लभा की स्मृति में यह संग्रह समर्पित करते हुए जब आकाश में बादलों की घटायें देखता है ,धरती पर समुन्दर के पानी को देखता है , उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है //
यह सम्पूर्ण संग्रह ...श्रंगार और करुण रस का एक मधु कलश है/कहीं सौन्दर्य की प्यास तो कहीं विरह की आग /कहीं मिलन की मधु - यामिनी तो कहीं वियोग का अंधकार / उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
यह संग्रह ३९ वर्षों के वैवाहिक जीवन की न सिर्फ दास्तान है बल्कि प्रकृति और प्रेम का एक साश्वत अभिलेख है /जीवन की कशमकश किसके साथ नहीं गुजरती लेकिन उसमें एक तना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है //
उर्वशी ...से भी अधिक सम्मोहन रखने वाली अपनी ...प्रियतमा के काल -कवलित हो जाने पर' तुषार जी ' की एकाकी ... छटपटाहट , जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/
इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है //
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा //

और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी //
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से ...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा है /नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है / यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ---
-कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है //
तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /शिल्प-- सज्जा का ध्यान रखता है / कथन - एक मंच की तरह है /अलंकार व समास --आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है / जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं /
अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है --
तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा /
लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है / कवि जब निराशा के गहन -अंधकार में घिरता है ,उसकी स्याह चादर में अपने साथ
सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा ,
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी /
इस जगह पर कवि ने बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...
देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो //
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी
अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है /
वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के
बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली
Manorma Mishra --main to dekhakar dang rah jati hun ki .jindagi ke har ahassas ko itni khoobsoorti se shabdo me kaise pirote hain aap...
Navin C. Chaturvedi---
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
Anand Pandey ----wonderful! Hum to samjhe the ki ashkon ki kishten chuk gayeen-- Par raat ek tasweer ne phir se taqaja kar diya.
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन /.......मैं अभी भी ’गीतों के बादल’ को फाहा-फाहा जी रहा हूँ. आपकी सोच के लालित्य और आपकी लेखिनी के संगीतमय प्रवाह में खूब डूब-उतरा रहा हूँ. इस पर विस्तार से साझा करूँगा. अभी कुछ समय और-और बहने दें./
Navin C. Chaturvedi आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' बार बार पढ़ रहा हूँ, वाह क्या गीत हैं, आनंद आ रहा है| एक तो मुंबई में वर्षा और उस पर आप के गीतों की रिमझिम,

Toshlendra Pandya-- sir, whether I think your the person who coming on earth to give colours in people blank life.....we need your regular colourful coments to enjoy the beautiful world of God.....
N.p. Jadaun Singh--- ,aapke dwara , AAPKE KAR KAMLON DWARA RACHIT PUSTAK "GEETON KE BAADAL " MUJHE MILI , AAPKI RACHNAON ME EK- EK SHABD SE SHINGAR RAS TAPAKTA HAI, AAP HUM JAISE KARORON PAATHKO KA MAN MOHTE RAHEN. AAPKO BAHUT- BAHUT BADHAIYA ISS SANSKARAN KE LIYE AUR DHANYAVAAD. NARENDRA SINGH JADAUN
Pawan Kumar --Thank you So Much Sir ji..!! Thank you sooo Very much....!! For sending me Your so Beautiful Creation...!! I Love those songs in that book "GEETON kE BAADAL" very much..!!
Subhash Sharma--- Aapke ye--' geeton ke badal ' hi nahi hain-- inmai samudar se bhi jyada gahrai hai.- Aakhen bahut rokne par bhi- gili ho jati hain. Aap ke liye hamare pas shabd nahi hain.-- Aapka Pathak.
Neeraj Tripathi--- ये तुषार के 'गीतों के बादल' हैं,
इनसे पार और कहाँ जाओगे,
इस जीवन की अथाह गर्मी में'
सारी नमी यही पाओगे
Anurag Jagdhari---------
असल ज़िन्दगी में ना जाने कितने झंझावातों से पार हुए हैं आप!सोचता हूँ ना जाने कैसे आप इन सब हालातों में भी कविता करते रहे.खैर दर्द भी कविता को जन्म देता है.अभी कुल जमा 14 कवितायेँ पढ़ी हैं.आप इन हालातों में भी कैसे इतना सृजन कर पाए,आश्चर्य होता है.शेष फिर ..........
Sarita Upadhyaya --तुषार जी ,
नमस्कार |
मैं बहुत दिनों से सोच रही थी की आपसे कहूँ न जाने क्यों साहस न जुटा पाई ,आज कह ही रही हूँ मैं भी आपकी पुस्तक ''गीतों के बादल ''को पढ़ने की बड़ी इच्छुक हूँ पार समस्या ये है की वर्तमान में, मैं इस्राएल में हूँ सो नहीं जानती आपसे कैसे कहूँ पुस्तक प्राप्त करने को ;क्या ये पुस्तक नेट प़र उपलब्ध है ---कृपया बताएं |
unluckly devendar ji , jab aapki pustak mili, main , bahut beemar hu. hospital me hu.bas lete -lete abhi bhumika hi padhi hai . man sochane par vivash ho gaya ki kabhi -kabhi insaan ke saath kuchh na kuchh aisa ghatata rahata hai jisaki use ummeed nahi hoti..sab kuchh aakankhaoon se pare hota hai... jaise kuchh aapke saath hua.....
bahut prerna mili mujhe aapse ki insaan ko himmat nahi khona chahiye .
R.k. Gupta ---तुषार जी --आपका हार्दिक अभिनन्दन....इतनी खूबसूरत कविता बहुत दिनों बाद पडी है.....जयशंकर प्रसाद जी की याद आ गई............इस कविता की तारीफ के लिए शायद मेरे पास शव्द नहीं है.............
Avanti Singh--- bahut achcha likhte hain aap tushar ji
AAP SACH M BAHUT UMDA LIKHTE HAI ....neya ashok
Navin C. Chaturvedi--- भोर की हैं अर्चनायें,
शब्दों के चितेरे हैं आप................. :)

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

Niya Ashok --TUSHAR JI --AAJ OFFICE MEN .. AAPKI "GEETON KE BADAL"MILI BAHUT ACCHA LAGA.. BHUMIKA HI PAD KR ..ANKHEN GILI HO GYN... BAHUT MAZBOOT INSAAN HAIN .. AAP ..JO ITNA DUKH SAHKAR BHI JEEVAN KA SANTULAN BANAYE HUE HAIN ....ITNE MUSHKIL DAUR MEN ...AAPNE ITNA UMDA LIKHA HAI.....AAP BAHUT MAHAN HAIN...
Madhuri Rawat- आपके शब्दों की कशिश भी कुछ कम नहीं तुषार जी /
Sarita Upadhyaya ---vaah apaki lekhani ko pranam lekhani se nikale ek ek shabd ko naman kya likhate hain ----!
Madhuri Rawat-- Command on both languages, Hats off Tushar his ...
Amit Tyagi-- with due respct 2 u... u r an excellent poet..
Kavi Deep Tadiya--- but light is ever same ....like you
Sanjay Kumar--- Tushar ji ,aap ki likhi har pankti men ek nayi soch hoti hai...
चेतन रामकिशन ---शानदार पंक्तियाँ,शानदार आह्वान,आपके सोहार्द पूर्ण, जोश पूर्ण साहित्य को नमन!
Kunwar Ajeet Singh Baghel ---Tushar Ji ,Aapki Kaviytaon ko padhkar lagta hai ki bas sab kuchh chodkar padhte hi raho .
Asha Pandey Ojha Asha ---bahut sundar ,bahut utsaah vardhk
Vijai K Singh--- Aapke paas kavya ki amulya nidhi jo hai ! ! !
Praveen Kumar--- nice lines sir ..........
Vasundhara Pandey ---beautiful sir
Rajesh Kumar Dubey ---हद है दिवानगी की ..वाह वाह
चेतन रामकिशन- आपकी ओजस्वी रचन्नाओं पर कुछ कमेन्ट करने के लिए शब्द ही नहीं मिल पते! बहुत अनमोल रचना!
Neeraj Tripathi- मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है , adbhut
Amit Tyagi-- bahut sundar...tushar ji
Sanjay Kumar---क्या कहने आप के सर जी आपकी लेखनी जादू है , आप का जबाब नहीं मैं आप का एक अदना सा प्रसंसक हूँ /
Madhuri Rawat--- कल्पना लोक में ले जाते है आप --तुषार जी ....
आनंद पाण्डेय ----आश्चर्यजनक,हम तो समझे थे कि अश्कों की किश्तें चुक गईं ---पर रात इक तस्वीर ने फिर से तगाजा कर दिया /
Saurabh Pandey ---नमस्ते.. आप विस्मित कर देते हैं.. आपको मेरा नमन ....

Neeraj Tripathi-- awesum sir...laajwaab...shringaar ras se labalab
Dinesh Verma ........
आदरणीय , हमें नहीं पता था कि आपका जीवन अनेक झंझावतों से गुजर चुका है... हम इस बात से भी अनभिज्ञ थे कि आदरणीया आपसे दूर जा चुकी हैं.. इन परेशानियों के सागर में डूबते-उतराते आपने जो सृजित किया है.. वह अमूल्य है... मैंने ''गीतों के बादल से '' कुछ बूँदें पंदह मिनट में पायी हैं,, ये बूंदे मुझे स्वाति की तरह लगी.. अब आपकी यह कृति मेरे लिए धरोहर तो है ही... दिशा निर्देशन का कार्य भी करेगी.... आभारी हूँ आपका.. जो मुझे इस लायक समझा.......
Sanjay Kumar
आप की रचना बहुत ही प्यारी होती है , ह्रदय से आभार

चेतन रामकिशन ----आपकी हर एक पंक्ति लाजबाव होती है!
**************===चेतन

सोमवार, 21 नवंबर 2011

कविता नवरसों से अपना श्रृंगार करती है /काव्य शिल्प उसे आकार देता है /भावनायें उसे झंकार देती हैं /शब्द संयोजन उसे अभिव्यक्ति देता है /मगर आधुनिक कवि, कविता को विकार के सिवा कुछ नहीं देता /वो कहता है यह उसका नवीनतम अविष्कार है / न जाने कितने प्रयोग वो कर चुका है अब तो हाइकू भी कविता का पर्याय बन चुका है /