वस्तुत: ''तुषार जी '' भावों के चितेरे हैं /भावात्मक आरोह- अवरोह की अद्भुत सामर्थ्य है उनमें / वो उसे शब्दों में गूंथ कर जीवंत कर देते हैं /''गीतों के बादल' ' काव्य संग्रह मुझे एक मित्र द्वारा ,अकस्मात ही प्राप्त हुआ /इससे पहले मैं ''तुषार जी '' को नहीं जानता था / मगर जब उनके गीत पदे ,अवाक् रह गया /मैंने समीक्षा भी लिख दी / आप अंदाज लगा सकते हैं मैं कितना प्रभावित हो गया था /सच तो यह है ''तुषार जी' ' मन में उतर कर रह ही जाते हैं / उनका अपने गीतों के बारे में यह कथन ----
''अगर किसी का मन ये छू लें , इनकी कीमत मिल जायेगी ''
'' तुषार जी'' को शायद न पता हो मगर उनके गीत अमूल्य हैं /
''तुषार जी का या संग्रह इतना सहज, सरल, सुगम है कि इसमें ---सरसता-- जिसे हम एक 'श्रेष्ठ काव्य' की झांकी कह सकते हैं इस संग्रह के शब्द -शब्द में घुली हुई है /भाषा पर अलंकारो का अतिशय बोझ नहीं है /कहीं -कहीं ' 'मितवा ' ' मनवा ' आदि शब्दों का प्रयोग भाषा में आकर्षण का केंद्र बन जाता है/बाल्मीकि से लेकर कालिदास तक ,पन्त से लेकर निराला तक बहुत कुछ है ,मगर ''तुषार जी' की बात ही और है /उनके गीत या जीवन संगीत में भेद करना मेरे बस में नहीं /
हमारी ,तुम्हारी आत्मा एक है /हम दोनों में कौई फर्क नहीं है /फिर हमारे अलग होने का कोई मतलब ही नहीं है/मैं स्वर्ग में आकर तुम्हें प्राप्त कर लूँगा /ईश्वर के सानिध्य में हम एक साथ रहेंगे / '' तुषार जी'' का विश्वास अपनी प्रियतमा के प्रति चिरंतन है वो दिवंगत प्रिया की पदचापें सुनते हैं ,वो नियति की क्रूरता से डरते नहीं ,सहमते नहीं /वो लार्ड ब्राउनिंग से भी अलग अपने प्रेम संबंधों में एक रागात्मकता देखते हैं/
उन्हें तिनका -तिनका रोता प्रतीत होता है ,सुबह लुटी हुई ,शाम झुलसी हुई प्रतीत होती है /ख़ुशी का कहीं एक कतरा भी नहीं दिखाई देता /मगर हिम्मत है ,दिलासा है , अपने प्यार पर यकीन है /वो कहते हैं ----
बाकी हैं कुछ मेरी साँसें ,आऊँगा तेरे पास कभी,
जग के बंधन खुल जाने तक , छाऊँगा तेरे पास कभी //
कवि इतने आँसू बहाकर भी हारा नहीं है /हताश नहीं है ,टूट चूका है मगर उदास नहीं है/ ' भवभूति ' के राम की करुणा , चाहे घनीभूत है वहाँ हताशा- निराशा है /राम सर्व शक्तिमान हैं /वे नियति और विधान तक बदलने की ताकत रखते हैं मगर सीता के वियोग में सोचते हैं -यह ह्रदय फट क्यों नहीं जाता ,इसके दो टुकड़े क्यों नहीं हो जाते /वो निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं /मगर 'तुषार' विक्षिप्त होते हुए भी तूफानों से लड़ते हैं /चिर -पतझड़ दोने के लिए तैयार हैं / कवि ने सिर्फ अविधा में भाव पिरोने का साहस किया है ,लक्षणा ,व्यंजना से परहेज /वो चाहता तो काव्य के शेष दो कारकों का इस्तेमाल कर सकता था मगर उसके भाव --
अनुभूति के इतने करीब हैं जहाँ और कुछ कहने को बचता ही नहीं /वो अपने अनुभाव -विभावों का बातावरण जैसे का तैसा उतार देना चाहता है/ 'प्रसाद ' के ' आँसू 'से भी कहीं ज्यादा उसके आँसू प्रवाहवान हैं ----
''तुमने ऐसी सजा सुनाई ,अभिलाषा आघात हो गई,
मेरे आँसू इतने बरसे ,बे मौसम बरसात हो गई//
शोक- संतप्त कवि अपनी प्राण बल्लभा की स्मृति में यह संग्रह समर्पित करते हुए जब आकाश में बादलों की घटायें देखता है ,धरती पर समुन्दर के पानी को देखता है , उसका द्रवित ह्र्दय रुक नहीं पाता /उसके शब्दों में प्रियतमा के प्रति जो उदगार हैं उसके हर गीत में प्रतिबिंबित होकर उसके साथ बिताये पलों को साकार कर देते हैं ----
''मेरा अंतर तुमसे बिम्बित ,इन बूँदों में झलक रहा है,
तुमको खोकर क्या -क्या खोया ,गम का सागर छलक रहा है //
यह सम्पूर्ण संग्रह ...श्रंगार और करुण रस का एक मधु कलश है/कहीं सौन्दर्य की प्यास तो कहीं विरह की आग /कहीं मिलन की मधु - यामिनी तो कहीं वियोग का अंधकार / उससे भी कहीं ऊपर... एक अनंत मिलन ....या महामिलन का.... दिवा स्वप्न /....एक -एक गीत को ....जीवन चक्र से.. इस तरह जोड़ देता है जैसे एक अनवरत जीवन संगीत --अपने स्वर में ,अपनी दिशा में , अपनी अनुगूंजें छोड़ता चला जा रहा हो/
यह संग्रह ३९ वर्षों के वैवाहिक जीवन की न सिर्फ दास्तान है बल्कि प्रकृति और प्रेम का एक साश्वत अभिलेख है /जीवन की कशमकश किसके साथ नहीं गुजरती लेकिन उसमें एक तना ... अजस्र प्रेम- बंधन... चिरंतन- बंधन...मोहक -बंधन ... शायद ही कहीं देखने को मिले /'तुषार जी 'जीवन की अग्निरेखा का जिस साहस से सामना करते हैं ,जीवन की उलझनों को जिस द्रदता से सुलझाते हैं इसके बाबजूद भी निराशा को घिरने नहीं देते /जीवन को एक उत्सव की तरह जी लेना चाहते हैं /उनके शब्दों में ----
जिन्दगी है एक उत्सव ,झूम जाने के लिए है ,
तुम अगर कुछ साथ दो तो गुनगुनाने के लिए है //
उर्वशी ...से भी अधिक सम्मोहन रखने वाली अपनी ...प्रियतमा के काल -कवलित हो जाने पर' तुषार जी ' की एकाकी ... छटपटाहट , जीवन की वेदनाओं को..... रिमझिमाते अश्रुओं से धोती चली जाती है /चाँदनी में तपती हुई देह .....वक्त की चिंगारियों में झुलसा हुआ मन या एक नितांत खालीपन उन्हें ''गीतों के बादल ''तक अनायास ही पहुँचा देता है /वो मन के भीतर तपते हैं ,जलते हैं और उनसे प्रगट हुए अंगारों को ...आँसू की अविरल गंगा से
बुझाने की कोशिस करते हैं/
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