बुधवार, 30 नवंबर 2011

Manorma Mishra --main to dekhakar dang rah jati hun ki .jindagi ke har ahassas ko itni khoobsoorti se shabdo me kaise pirote hain aap...
Navin C. Chaturvedi---
तुषार भाई आप की पुस्तक 'गीतों के बादल' को पढ़ने के बाद दो बातें कहना चाहता हूँ:-
:- पहली तो ये कि मैं कंफ्यूज हूँ कि आप को गीतकार कहूँ या शायर| जहाँ एक ओर नदी की अविरल धारा की तरह बहती शब्द सरिता हिन्दी के करीब होने के कारण गीतों का आभास देती है| वहीं दूसरी तरफ, मोर देन ९०% केसेस में आप की रचना बहर से बतियाती हुई एक अलग तरह से ही भले, पर शाइरी की मिसाल भी पेश करती है| खैर हम इसे पाठक माई बाप के ऊपर छोड़ देते हैं|
:- और दूसरी बात जो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ वो ये कि अगर किसी बंदे ने इस पुस्तक के किसी भी पन्ने को खोल कर कोई सी भी चार लाइन पढ़ लीं, तो खरीदे बिना नहीं रहेगा|

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