गाजियाबाद, विगत रविवार ''काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान में एक रसभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया /जिसमें प्रख्यात कवियों तथा कवित्रियों ने भाग लिया /
डा ० कुंवर बैचैन , देवेन्द्र चौधरी ''तुषार '', डा ० अशोक सक्सेना ,डा ० जय शंकर शुक्ल ,डा ०अंजू सुमन , वंदना कुंवर आदि ने काव्यपाठ कर अपनी रचनाओं से समाँ बांध दिया /गोष्ठी की अध्यक्षता डा ० बैचैन ने की तथा संचालन डा ० शुक्ल ने किया /गीत , कविताओं तथा गजल की यह महफ़िल इतनी शानदार थी कि श्रोता गण झूम उठे /''तुषार '' का गीत---- ''दर्द कितनी याद लेकर,अधखिली -सी भोर लेकर ,
अधखिले से फूल लेकर ,चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर/
''तथा वंदना की कविता ---- बारूद से ,न चाक़ू से, न खंजर से बात कर,
कुंवर बैचैन का छन्द ---सुबह जब घूमने को जाता हूँ ,नीम की पत्तियां चबाता हूँ ,
जितनी कडवाहटें हैं दुनिया में ,मैं उन्हीं को दवा बनाता हूँ/......आदि रचनाओं ने गोष्टी को एक यादगार गोष्टी में बदल दिया /
हिंदी कवितायें न सिर्फ साहित्यिक परिचर्चा का विषय हैं यह सांस्कृतिक परिवेश को भी सुसंस्कृत करतीं हैं /देवेन्द्र चौधरी ''तुषार ''के निवास स्थान पर आयोजित यह गोष्ठी
कुछ साहित्यिक विषयों पर भी चर्चा में रही /साथ ही देश में साहित्य के प्रति बदते रुझान का स्वागत किया गया/
भवदीय -
देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
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