शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

Tushar Devendrachaudhry
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सच प्रतीत होता है /इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है ,
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा ,
March 30 at 7:08am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
Tushar Devendrachaudhry
और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी ,
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /
प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से
...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा हैSee More
March 30 at 6:50am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,
चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /
March 30 at 5:05am ·LikeUnlike · ·UnsubscribeSubscribe
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Tushar Devendrachaudhry
उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/
कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /
दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व
अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है

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