सोमवार, 23 मई 2011

तुषार जी !'गीतों के बादल' ने 'गीतों की बरसात' में भिगो दिया.जीवन में सुख दुःख सबके हिस्से आते और भोगे जाते हें.संवेदनशील मन में ऎसी एक-एक घटना अणु-विस्फोट सी फूटती है और कभी कभी कविता या लेखन में फूट बहती है.आपका प्रकरण अनूठा है -युवा-काल की दहलीज़ पर अनुज को खोने का दारुण दुख, फिर,उस वय के सहज प्राकृतिक आकर्षणों के मरहम, तदन्तर अत्यंत रागमय सहचरी के चन्दन जैसे अनुराग की गहराई और सौंदर्य में डूबते ही जाना,अकस्मात् , परम प्रिय पुत्री का अकाल ही चले जाना,एक पुत्री के विवाह से जुड़ी विषम अत्यंत त्रासक समस्याओं का सिलसिला,और, अंतत: सहचरी का दैहिक अवसान.यह सब आप के संवेदनशील अंतर में अनवरत अणु-विष्फोट की तरह फूट-फूट कर पीड़ा और प्रेम, संयोग और वियोग, लयपूर्ण अभिव्यक्ति और सटीक सार्थक शब्दों में भाव भरे घने मेघों की तरह घुमड़-घुमड़ कर झड़ी लगा कर बरसते ही चले गए हैं, बरसते ही जा रहे हैं. निश्चय ही जिस प्रकृति ने आपको इतना संवेदनशील बनाया है उसी ने आपको 'बिखरने' से बचाने की सहन शक्ति देने के लिए यह काव्य धारा भी प्रदान की है -"फूल उठा है अमलतास पर पीले फूलों के सहे ले.ऐसे ही क्या धीरे धीरे से,टूटा संबल, जुड़ जाता हैरह सकता जो योगी-सम, वहराज पुरुष भी बन सकता है."उपर्युक्त पंक्तियाँ लिखने के बाद भी आपके अन्दर-बाहर से बहुत कुछ रीत गया है , लेकिन निश्चय ही अब भी आपके अन्दर फूट रहे कविता के सोते कंठ-आपूरित पीड़ा को थोड़ा सा निसृत करेंगे. आपकी कविताएँ बहुत से पाठकों को भाएँगी, आनंद देंगी, सहारा देंगी. उनके हिस्से इतना ही आएगा. बार बार जिस पीड़ा को भोग कर आप अपनी कविता की एक एक पंक्ति का सृजन कर रहे हैं उसे भोगना 'आप की ही' नियति है, पाठक तो उसे अंशमात्र ही छू सकेंगे.विनम्र आदर और ढेर सी शुभ काम्नाओं सहित,--राकेश तिवारी

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