शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

उक्त दोनों मुक्तक इस कृति के आमुख माने जा सकते हैं /प्रथम में कवि प्रीत की फुहार को ,धूप -छाँव से सने पलों को,झील की आभा में झाँक कर अपनी भाव -प्रवंचनाओं को व्यक्त करता है /प्रियतमा के स्वच्छ निर्मल बिम्बों को प्रकृति के शाश्वत फ्रेम में जड़ देता है /यह कृति का एक रंग है /दुसरे मुक्तक में कवि महादेवी वर्मा की भाँति ---मैं नीर भरी दुख की बदली अथवा जय शंकर प्रसाद जी के ---आँसू ---की तरह अपनी पीड़ा को एक गरल की तरह हँसते - हँसते पी जाना चाहता है / रचनाओं को इस करीने से सजाया व संवारा गया है ,कि एक लय -प्रवाह अंत तक कहीं टूटता नहीं है ,कहीं बिखरता नहीं है अपितु कवि दिल -दिमाग पर छा
जाता है/उदाहरण के लिए ----
निमिष -निमिष नयनों में क्या है ,एक झील सी प्रीत तुम्हारी,
अंग -अंग पर खेल रही है ,धूप तुम्हारी छाँव हमारी //
एवम
छुपे -छुपे ही रह जाते हैं ,अक्सर आँखों में कुछ आँसू ,
जीने वाले जी लेते हैं ,पी -पी कर ही अपने आँसू //

श्रंगार को रसराज कहा गया है, डा ० हरिवंश राय बच्चन के अनुसार कवि रूमानी- भावनाओं को सहजता से अभिव्यक्त करने में सफल है ,इसमें कोई शक नहीं /गीतों के बादल---- में कवि के कुछ गीत श्रंगार की इस रसमयता को तन्मयता से भर देने में सक्षम हैं------
जितनी रस की धारायें थीं ,उन्मीलित-सी परिप्लावित थीं,
दिशा -दिशा में आवाहन था , मंद हवायें आह्लादित थीं //
एवम
तुम नहाकर चाँदनी में , केश अपने मत सुखाओ ,
रात ठिठकी सी हुई है , चाँद ठिठका -सा खड़ा है //

कवि अपने जीवन की रिक्तता का भी आभास बड़ी सहजता से कराता है ,वो प्रकृति और
प्रियतमा में ऐसा साम्य स्थापित कर देता है कि उसकी अभिव्यक्ति बिम्बों को एकाकार
कर देती है /ऐसा अद्भुत समायोजन ....नदी के दो किनारों की तरह ,प्रीत के दो किनारे नहीं हो सकते ,यह ---तुषार-- जैसे कवि की सामर्थ्य का प्रमाण है /कवि अमूर्त प्रेम को मूर्त प्रेम में ,,,मूर्त प्रेम को अमूर्त प्रेम में ,रेखांकित करता है या मन को ,कहाँ तक छूता हुआ निकल जाता है पता नहीं चलता /


प्रीत के दो - दो किनारे ,हो नहीं सकते यहाँ पर ,
एक तुम छूलो बहाँ पर, एक में छूलूं यहाँ पर //
उक्त तीनों अन्तराएँ प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करने के लिए एक अभिनव उद्यम हैं /कवि द्वारा प्रथम अंतरे में प्रकृति के सुन्दर प्रतीकों का प्रयोग ,प्यार की खुशबु बिखेरने का ,बसंत के आगमन पर नव कोंपलों का आकार लेती प्रियतमा का ,मन प्राणों में घुल जाने का द्रश्य देखते ही बनता है /
इसी प्रकार विप्रलंभ श्रंगार या वियोग श्रंगार के चित्रण देखें ----
जब तुझे पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,
अब बहारों में हमारा छटपटाना रह गया है //
एवम
मैं पराजित हो गया हूँ ,मानने में हर्ज क्या है ,
...तुम लड़ो या मत लड़ो ,यह बक्त तो लड़ता रहेगा //
और थोड़ा आगे चलें ....
सिर्फ आँचल में तुम्हारे ,बंध नहीं सकती जवानी ,
तन-बदन से छन रही है सौ बहारों की रवानी //
कवि ,जवानी के उद्दाम वेग को बांध सके यह उसके बश की बात नहीं /प्रियतमा की काया की, सैकड़ों बहारों से तुलना करके किसी भी लफ्फाजी से ...परे होना चाहता है /कवि का यह कथन कि उसने इन पलों को जीकर लिखा है नयनों को झील की संज्ञा युगों- युगों से दी जाती है पर यहाँ उनकी ताजगी में डूबने की बात ,चाँद के ठिठकने की बात ,चाँदनी रात में केश सुखाने की बात ,कवि के अद्भुत काल -जई प्रेम की कहानी कह रही है /

उक्त उदाहरणों में कवि द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को श्रंगार में भिगो -भिगो कर व्यक्त किया गया है/
कवि समस्त रस-धाराओं में--- प्रेम ---को आप्लावित कर ,समस्त सृष्ठी में ओत-प्रोत कर देता है /दसों दिशायें हों ,उन्चासों समीर, उसके स्वर से स्वर मिलाते जान पड़ते हैं /स्नेह- राग ,की इतनी अभूतपूर्व अभिव्यक्ति ...प्रियतमा का आँचल पूरे जगत का बिस्तार हो जाता है - यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //
कवि शब्द चयन में मनोभावों को बाँधने में इतना सक्षम है कि शिल्पगत बिविधता के बिना भी
एक नया शिल्प रच देता है /उसकी शाब्दिक ध्वनि का निरूपण देखें ---
नयनों में सावन आता है ,नयनों में पतझड़ होता है ,
नयनों में प्रियतम बसता है, सपनों का मरमर होता है //
यहाँ मरमर शब्द हवा की ध्वनि का संकेत है जो कवि के द्वारा बहुत ही मनोरम तरीके से प्रयोग किया गया है /इस तरह का प्रयोग ध्वनि शाष्त्र के प्रवर्तक आचार्य आनंद बर्धन की कृति ध्वन्यालोक में निरुपित किया गया है/
तुषार--के आलोच्य संग्रह में शब्द अपने सर्जक के मनोभावों पर नृत्य करते हैं /शिल्प ,सज्जा का ध्यान रखता है / कथन , एक मंच की तरह है /अलंकार व समास आवश्यक भाव भंगिमायें हैं /और इनसे जो रस की निष्पत्ति होती है अभूतपूर्व माधुर्य में बदल जाती है /जैसे इस जगत की या वक्त की परिणति तक पहुँचा देती है /उसके अनुसार जगत का सार प्रेम है --
जब तुम्हें पाया जगत में ,कुछ बहारें आ गईं थीं ,अन्यथा सब निस्सार है /कवि अपने मिथ्या अहम् को अपनी हार के रूप में स्वीकार करने से नहीं झिझकता मगर वो अपने प्रेम का बक्त के साथ टकराव भी स्वीकार करता है /तुम लड़ो या मत लड़ो ,ये वक्त तो लड़ता रहेगा ,लेकिन वो अपने और अपने प्रेम के आस्तित्व को क्षणभंगुर मानने से इंकार कर देता है / कवि जब निराशा के गहन -अंधकार में घिरता है ,उसकी स्याह चादर में अपने साथ
सब कुछ समेट लेना चाहता है .....
चाहे कितने अश्रु बहा लूँ ,तुम्हें न बापस ला पाऊंगा ,
चाहे कितना प्यार जता लूँ ,तुम्हें न फिर से पा पाऊंगा //
वो एक ऐसे कथ्य में डूब जाता है ,जिसकी कल्पना जायसी ,घनानंद जैसे कवि भी नहीं कर पाये /बिद्यापति के भावों में भी इतनी रहस्य बेदना शायद न होगी / इस जगह पर कवि बड़ी चित्रकारी से नयनों को प्रकृति पर अबलंबित कर उसका विबेचन किया है /
तुषार; कविता को लिखते नहीं हैं वरन जीते हुए निकल जाते हैं /उनका यह जीना ,मरना कोई भी पाठक या व्यक्ति झील सी गहरी आँखों में झाँक कर देखेगा तो खुद व खुद समझ आ जायेगा /कवि का अंदाजे बयाँ एक साथ कितने जादू कर देता है ,देखते ही बनता है/

तुषार का एक शब्द चित्र देखें ----
कुछ चोर नयन ,कुछ मोर नयन ,कुछ खंजन और चकोर नयन ,
कुछ पीन नयन ,कुछ मीन नयन ,कुछ हिरनी से चित चोर नयन //

कवि बिना कोई परवाह किये परम्परागत गीतिकाव्य -धारा पुष्ट करता हुआ ,उसे नयी भव्यता देकर एक उत्कृष्ट काव्य- संग्रह हिंदी साहित्य को देने में न केवल सफल हुआ है ,बल्कि एक भीनी- भीनी रसधारा से परिप्लावित कर अपने पाठकों में लोकप्रिय हो चुका है /

संक्षेप में कवि ने अनुभूतियों के अनुभाव - विभाव का अमृत मंथन किया है /वो अपनी मधुशाला को ,अपने गीतों को ,अपने जीवन से निचोड़ कर भरता है /आज भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में ,हिंदी कविता अपनी दशा और दिशा निर्धारित नहीं कर पा रही है /क्या लिखा जाये क्या नहीं ,तरह -तरह के शिल्प -विधा चल पड़े हैं /यहाँ तक कि शब्दों का प्रयोग भी स्थिर नहीं है,...

देख लीजिये तुषार; क्या कह रहे हैं -----
क्या पता इस जिन्दगी के पार कोई जिन्दगी हो ,
जो विधाता से बड़ी हो, जो तुम्हीं से बस उगी हो //
निराशायें हार जातीं हैं ,कवि जीत जाता है ....
उसकी लेखनी में प्रसाद की कसमसाहट ,महादेवी रहस्य पीड़ा भी अगर झलकती है तो अपने विशिष्ट परिवेश को उदघोषित करके झलकती है / वो पंत और निराला की तरह एक चित्र ही नहीं बनाता ,चित्र में घोर निराशा के बाबजूद ,प्राणोंन्मेश भी कर देता है /
समीक्षाकार --- डा० जय शंकर शुक्ल' किरण 'ऍम .ऐ .ऍम .एड .पी .एच .डी .
शिक्षा विभाग ,दिल्ली सरकार [काव्य संग्रह गीतों के बादल ]तुषार'अयन प्रकाशन , नयी दिल्ली

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